19 July 2017

हिन्दू-विरोध से हाशिये पर आते राजनैतिक दल-व्यक्ति

भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में हिन्दुओं को लेकर एक अजीब सा वातावरण लगातार बना रहा है. आज़ादी की लड़ाई में भले ही हिन्दू-मुस्लिम एकता के गीत गाये जाते रहे हों किन्तु आज़ाद भारत में तो कोशिश यही की जाती रही है कि हिन्दू-मुस्लिम विभेद पनपता रहे. इस विवाद को और बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर हिन्दुओं को ज़लील करने का, उनको मानसिक प्रताड़ित करने का, उन पर शारीरिक अत्याचार करने का काम भी होता रहा है. ऐसे माहौल को विगत तीन वर्षों से और भी हवा दी जाने लगी है. इसके पीछे केंद्र की राजनीति में भाजपा का आ जाना रहा है. भाजपा के आने से भी ज्यादा बड़ी घटना ऐसे लोगों के लिए नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने की रही. हिन्दू धर्म के विरोधी राजनैतिक लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि केंद्र की सत्ता भाजपा इतने विशाल बहुमत से प्राप्त कर लेगी. राजनैतिक उच्चावचन के क्रम में सभी को इसका आभास बना हुआ था कि देश की शीर्ष सत्ता में कांग्रेस गठबंधन और भाजपा गठबंधन ही क्रमिक रूप से आते-जाते रहेंगे मगर किसी भी राजनैतिक विश्लेषक अथवा प्रतिनिधि ने इसका विचार कभी नहीं किया था कि भाजपा ऐसे प्रचंड बहुमत से आएगी. इसके आगे किसी ने ये भी विचार नहीं किया था कि कांग्रेस को आँकड़ों के खेल में विपक्ष के नेता पद का मिलना भी दूभर हो जायेगा. कोढ़ में खाज वाली स्थिति उस समय पैदा हो गई जबकि ऐसे प्रचंड बहुमत के चलते पूर्व घोषित नरेन्द्र मोदी ही प्रधानमंत्री बने. ये स्थिति उन लोगों के लिए अत्यंत कष्टकारी थी जो नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा के साथ ही अगले को हत्यारा, खूनी दलाल  कार्यालय में चाय बेचने के लिए नियुक्ति आदि जैसी दो कौड़ी की बात करने लगे थे.


इसके बाद भी इन राजनैतिक कुंठित लोगों की मनोवृत्ति पर कोई अंतर नहीं देखने को मिला. हिन्दुओं के प्रति नफरत का भाव और तीव्रता पकड़ने लगा. देश के अनेक इलाकों में संगठित रूप से हिन्दुओं पर, संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले किये जाने लगे. मुस्लिम तुष्टिकरण और तेजी से किया जाने लगा. इसके पीछे उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव था. प्रदेश की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों को लग रहा था कि वे अपने-अपने वोट-बैंक की मदद से प्रदेश की सत्ता को प्राप्त कर लेंगी. एक काम बोलता है और मुसलमानों के सहारे सत्ता पाने की चाहत सजाये बैठी थी तो दूसरे दल का हिसाब उसके दलित वोटों पर निर्भर था. प्रदेश के चुनाव ने दोनों के दिमाग को कई-कई वाट का झटका दिया. मतदाताओं ने अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग करते हुए इन दोनों दलों के तुष्टिकरण हथियार को मोथरा कर दिया. मतदाताओं के इस संगठित स्वरूप के पीछे भी इन्हीं राजनैतिक लोगों की हिन्दू विरोधी मानसकिता प्रमुख रही. जाति-वर्ग और मजहब के तुष्टिकरण को साथ लेकर बढ़ते ऐसे दलों ने सोचा भी नहीं होगा कि हिन्दू-विरोधी मानसिकता दर्शाने के कारण इन लोगों का ऐसा हाल होगा कि सीटों का आंकड़ा पचास की संख्या भी न छू सकेगा. जिस दल ने अपने दलित वोट-बैंक के चलते राजनीति में टिकट व्यापार आरम्भ किया उसको तो बीस की संख्या पाने के लाले लग गए. पाँच साल का काम बोलता है दिखाने की जल्दबाजी में ट्रेन भी दौड़ाई गई, हाईवे को भी दिखाया गया, हाईवे पर लड़ाकू विमान भी उतारे गए मगर संगठित हिन्दू मानसिकता ने सबको जमीन पर उतार कर रख दिया.

केंद्र की जबरदस्त पराजय और हिन्दू मानसिकता की विजय को अभी लोग पचा भी नहीं पाए थे कि उत्तर प्रदेश की प्रचंड विजय ने सबके दिमाग में असंतुलन पैदा कर दिया. कोई ईवीएम को दोष देने लगा कोई बड़े स्तर पर देश-प्रदेश में उपद्रव होने की बात करने लगा, किसी को असहिष्णुता दिखाई देने लगी तो किसी की बीवी को यहाँ रहते हुए डर लगने लगा. हिन्दू-विरोधी मानसकिता वालों पर अभी एक चोट और लगनी बाकी थी. प्रदेश की ऐतिहासिक विजय के बीच मुख्यमंत्री के लिए मंथन चलने लगा और कई दिन के समुद्र-मंथन के बाद जो नाम उभर कर सामने आया उसने हिंदुत्व गरिमा को और प्रकाशवान किया. योगी आदित्यनाथ का नाम सामने आते ही हिन्दू-विरोधी मानसिकता वालों को धरती घूमती नजर आने लगी. वे सब हिन्दू धर्म के लिए अनाप-शनाप बकने लगे. इन लोगों को समझ आ गया कि मुस्लिम तुष्टिकरण अब जीत का आधार नहीं है; दलित वोट-बैंक के सहारे सत्ता हथियाई नहीं जा सकती है; यादवों अकेले के दम पर काम नहीं बोलता है. दलितों, पिछड़ों की राजनीति के सहारे अपनी-पानी जेबें भरने वाले इन दलों को अपने आसपास बहुत बड़ा शून्य दिखाई देने लगा.


इस शून्य का ब्लैक होल में बदलना अभी जारी था. केंद्र और सबसे बड़े प्रदेश के बाद देश के प्रथम नागरिक का निर्वाचन शेष था. भाजपा के थिंक टैंक ने दलित कार्ड के साथ-साथ संघ की पसंद का सम्मान करते हुए जिस व्यक्ति को राष्ट्रपति निर्वाचन के लिए चुना उसने दलित राजनीति करने वाले तमाम दलों की रीढ़ तोड़कर रख दी. एक झटके में ऐसे सभी दलों को आईना दिखा दिया गया कि दलित की राजनीति करने वाले कैसे दौलत की राजनीति करने लगे हैं. लगातार हाथ से निकलती बाजी देखकर बौखलाहट इतनी तेज हो गई कि कोई इस्तीफ़ा देकर भाग निकला तो कोई भगवानों को शराब के ब्रांड से जोड़ने लगा. असल में ये सिर्फ अपनी खीझ नहीं वरन भाजपा की रणनीति की काट न खोज पाने की झुंझलाहट है. देखा जाये तो न सिर्फ भाजपा के प्रति खीझ वरन हिन्दुओं के प्रति भी आक्रोश है. इसी आक्रोश के चलते वे गाली देने की स्थिति में हैं. ये और बात है कि सदन की गरिमा का ख्याल रखते हुए वे भाजपा को, मोदी को, हिन्दुओं को माँ-बहिन की गलियां नहीं दे पा रहे हैं तो अपनी खिसियाहट को किसी और रूप में निकालने में लगे हैं. एक तरह से उनकी ये खिसियाहट हिन्दू समाज के लिए जागरण का काम कर रही है. कम से कम इन्हीं बातों का जवाब देने के लिए हिन्दू समाज अब जागृत हो रहा है. 

11 July 2017

धर्म-विहीन आतंकवाद का अमरनाथ यात्रा बस पर हमला

गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई के बीच, किसी के बाप का नहीं है हिंदुस्तान की मंचीय चिंघाड़ के बीच, सहिष्णुता-असहिष्णुता की नौटंकी के बीच आतंकियों ने अपना काम करके दिखा दिया. इस बार अमरनाथ यात्रा पर संकट के बादल पहले से ही मंडरा रहे थे. सुरक्षा एजेंसियों ने भी खतरे को देखते हुए हमले की आशंका व्यक्त की थी. ये हमला आतंकियों ने किया जबकि इससे कुछ समय पूर्व अमरनाथ यात्रा काफिले पर पत्थरबाजी की गई थी. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में चरमपंथी, अलगाववादी नहीं चाहते हैं कि अमरनाथ यात्रा सुचारू रूप से चले. इस हमले के सन्दर्भ में एक विशेष बात गौर करने लायक है कि आतंकियों ने हमले के लिए अनंतनाग को चुना. ये वही अनंतनाग है जहाँ लोकसभा उपचुनाव को अलगाववादियों की चुनाव बहिष्कार करने की धमकी के चलते रद्द करना पड़ा. अनंतनाग के पूर्व श्रीनगर में हुए लोकसभा उपचुनाव में सात प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ था. कुछ जगहों पर पुनर्मतदान कराया गया जो मात्र दो प्रतिशत के आसपास रहा. इससे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अलगाववादियों की हनक का पता चलता है.


देश में लोकसभा चुनाव से पूर्व ही तमाम राजनैतिक दलों द्वारा जिस तरह से भाजपा और मोदी के खिलाफ हवा बनाई गई, जिस तरह से मुस्लिमों के मन में नफरत भरी गई वो तबसे और चरम पर है जबसे भाजपा केंद्र में सत्ता में आई है. नफरत का आलम ये है कि देश के उच्च शैक्षणिक संस्थान में आतंकी के समर्थन में नारेबाजी की जाती है. ये नफरत की स्थिति उस समय और भी चरम रूप में दिखी जबकि जम्मू-कश्मीर में भाजपा गठबंधन सरकार में शामिल हुई. पाकिस्तान की तरफ से मिलती आतंकी शह का दुष्परिणाम ये हुआ कि वहाँ अलगाववादियों ने अपनी दुर्दांत हरकतों को और तेजी से करना आरम्भ कर दिया. जम्मू-कश्मीर में आतंकी के जनाजे में हजारों की भीड़ इकठ्ठा होती है वहीं दूसरी तरफ सेना के ऊपर पत्थरबाजी की जाती है. वहाँ देश का राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाता है, पाकिस्तानी झंडा लहराया जाता है, सैनिकों का अपमान किया जाता है. ये कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं की निरंतरता के बाद भी उन पर सख्ती बरतने के किसी भी प्रयास को न केवल राज्य सरकार द्वारा वरन अदालत द्वारा भी रोका गया. सेना को सैनिकों को परेशान करने वालों को भटका हुआ बताकर कहीं न कहीं अलगाववादियों को चरमपंथियों को ही संरक्षण दिया गया. इसी का दुष्परिणाम है कि सरकार के चाहने के बाद भी राज्य में शांति का माहौल नहीं है.


अमरनाथ यात्रा की बस पर हालिया आतंकी हमला विशुद्ध रूप से उस खिसियाहट के नतीजा है जो जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता, चरमपंथी नेता, पाकिस्तान समर्थित आतंकी आये दिन दर्शाते हैं. ये हमला यात्रियों को डराने की दृष्टि से नहीं वरन सरकार को सीधे-सीधे ये सन्देश देने के लिए किया गया है कि वे किसी भी तरह से सरकारी तंत्र से डरते नहीं हैं. आतंकियों ने स्पष्ट रूप से सन्देश दिया है कि तमाम सरकारी सुरक्षा व्यवस्था के बाद भी वे हमला करने में, मासूम, निर्दोष यात्रियों को मारने में सफल रहे हैं. ऐसे में अब सरकार की तरफ से सिर्फ निंदा करके, चंद श्रद्धांजलि शब्द अर्पित करके, कड़ी कार्यवाही किये जाने की बात कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाएगी. आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, कहकर कुछ धर्मनिरपेक्ष अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश करते नजर आयेंगे. कुछ अलगाववादी नेता भी अपने आपको उभारने के लिए आगे आते दिखेंगे. कुछ दिन बाद सब इस हमले को भूल जायेंगे क्योंकि संभव है तब तक नेताओं की शांति-समझौते जैसी खोखली प्रक्रिया के बीच आतंकी कोई और हमला कर बैठें.  

06 July 2017

एक देश में दो विधान, नहीं चलेंगे-नहीं चलेंगे

आज शिक्षाविद और चिन्तक होने के साथ-साथ भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्मदिन है. उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता आशुतोष मुखर्जी बंगाल के जाने-माने वकील थे. वे 1923 में ही सीनेट के सदस्य बन गये थे. सन 1926 में लिंकन्स इन में अध्ययन करने के लिए वे इंग्लैंड गए और 1927 में बैरिस्टर बन गए. उनको तैंतीस वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया. यह भी अपने आपमें विश्व रिकॉर्ड है. वे विश्व में सबसे कम उम्र के कुलपति बने. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अनेक रचनात्मक सुधार कार्य किए तथा कलकत्ता एशियाटिक सोसायटी में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया. वे इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ साइंस, बंगलौर की परिषद एवं कोर्ट के सदस्य और इंटर-यूनिवर्सिटी ऑफ़ बोर्ड के चेयरमैन भी रहे. 


कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए वे कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद के सदस्य चुने गए किंतु उन्होंने अगले ही वर्ष इस पद से त्यागपत्र दे दिया. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और निर्वाचित हुए. वे हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में उभरे और शीघ्र ही हिन्दू महासभा में शामिल हुए और सन 1944 में इसके अध्यक्ष नियुक्त किये गए. महात्मा गांधी ने उनके हिन्दू महासभा में शामिल होने का स्वागत किया क्योंकि उनका मत था कि हिन्दू महासभा को मदन मोहन मालवीय जी के बाद किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन की जरूरत थी. राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता के प्रति आगाध श्रद्धा के चलते उन्होंने हिन्दू महासभा  का नेतृत्व ग्रहण कर अंग्रेज़ों की फूट डालो व राज करो और मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की नीति का विरोध किया.

जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया था. 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक गुरु गोलवलकर जी से मिले. गुरु जी से परामर्श करने के बाद 21 अक्तूबर 1951 को उन्होंने दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और इसके पहले अध्यक्ष बने. सन 1952 के चुनावों में भारतीय जनसंघ ने संसद की तीन सीटों पर विजय प्राप्त की जिनमें से एक सीट पर डॉ० मुखर्जी जीतकर आए. अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के चलते उन्होंने संसद के भीतर राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी बनायी. जिसमें 32 सदस्य लोकसभा से तथा 10 सदस्य राज्यसभा से थे, हालांकि अध्यक्ष द्वारा एक विपक्षी पार्टी के रूप में इसे मान्यता नहीं मिली.


तत्कालीन जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था. वहाँ के मुख्यमंत्री को  प्रधानमंत्री कहा जाता था. डॉ० मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने जोरदार नारा भी दिया एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे-नहीं चलेंगे. अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा. 11 मई 1953 को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार ने डॉ० मुखर्जी को हिरासत में ले लिया. इसके पीछे डॉ० मुखर्जी का बिना परमिट लिए जम्मू-कश्मीर चले जाना था. आपको बताते चलें कि उन दिनों कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को भी पासपोर्ट के समान एक परमिट लेना पडता था. गिरफ़्तारी के बाद डॉ० मुखर्जी को नजरबंद कर लिया गया. जहाँ कुछ दिन बाद ही 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु का खुलासा आज तक नहीं हो सका है. भारत की अखण्डता के लिए आज़ाद भारत में यह पहला बलिदान था. इसका परिणाम यह हुआ कि शेख़ अब्दुल्ला हटा दिये गए और अलग संविधान, अलग प्रधान एवं अलग झण्डे का प्रावधान निरस्त हो गया। धारा 370 के बावजूद कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है, इसका श्रेय डॉ० मुखर्जी को ही दिया जाता है. आज भी उन्हें प्रखर राष्ट्रवादी और कट्टर देशभक्त के रूप में याद किया जाता है. वे सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतों के पक्के इंसान थे. 

01 July 2017

उस प्यारे से बचपन में

आज एक जुलाई है. सभी हिन्दी ब्लॉगर ख़ुशी मना रहे हैं, अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर डे मनाए जाने की. उधर सरकार और इनके सहयोगी-समर्थक प्रसन्नता दर्शा रहे हैं, देश में एक क़ानून के आधी रात से लागू होने की. जी हाँ, आज एक जुलाई से ही देश में एक कर व्यवस्था GST लागू कर दी गई है. अब कर व्यवस्था में पुराने तमाम कर निष्प्रभावी हो गए हैं. वे कर अब याद बन गए हैं, स्मृतियों में हैं.
 व्यक्ति का जीवन भी कुछ ऐसा ही है. समय गुज़रता जाता है. कुछ नया आता रहता है. कुछ पुराना हो जाता है. वो पुराना बस याद बन जाता है, स्मृतियों में बस जाता है. बचपन की भी कुछ ऐसी ही स्थिति होती है. एक बार चला जाता है तो लौटकर नहीं आता है.
चंद पंक्तियाँ उसी बचपन पर...

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हर बात सुहानी लगती थी, उस प्यारे से बचपन में। 
हम मौज मस्त में डूबे थे उस प्यारे से बचपन में॥ 
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वो प्यारे संगी साथी सारे, वे गाँव की धूल भरी गलियां। 
ओढ़ के चादर अल्ल्हड़ता की, गलिओं में दौड़ा करते थे।। 
खेतों की वो हरियाली से, मन का मतवाला हो जाना। 
वो बाग़ बगीचों की मस्ती, पेड़ों पर झूला करते थे॥ 
सुहानी भोर की प्यारी धुन, ढलती शाम का मस्त समां। 
सब कुछ अलबेला लगता था, उस प्यारे से बचपन में॥ 
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सावन के बलखाते झूलों से, उड़ करके नभ को छू लेना। 
काले बादल की रिमझिम में, मस्ती में भीगा करते थे॥ 
थक करके जब भी आयें हम, माँ के आँचल की छाँव मिले। 
दादी से किस्से सुन-सुन कर, सपनों में उड़ते रहते थे॥ 
पंछी की तरह से उड़ जाना, बहती नदिया जैसा बहना। 
सब कुछ कितना मासूम सा था, उस प्यारे से बचपन में॥ 
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जीवन के तंग झमेलों में फंस, भूले बचपन की मुस्कानें। 
न दौड़ सके फ़िर बागों में, फ़िर बारिश में न भीग सके॥ 
रुपया, पैसा, रोटी, कपड़ा, इस चक्रव्यूह में उलझ गए। 
बचपन रूठा, घर भी छूटा, माँ के आँचल में फ़िर सो न सके॥ 
याद सुहाने बचपन की अब, इस दिल को धड़का देती है। 
सिरहन सी मचती है तन में, मन को चंचल कर जाती है।। 
थके हुए इस टूटे दिल की, अब तो इतनी ख्वाहिश है। 
ले जाए फ़िर से कोई हमें, उस प्यारे से बचपन में॥ 

30 June 2017

सैंपल सर्वे के जनक पीसी महालनोबिस

प्रतिवर्ष 29 जून को सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन देश के प्रसिद्द वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद प्रशांत चंद्र महालनोबिस का जन्म 1893 को कोलकाता में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके दादा गुरु चरन महालनोबिस द्वारा स्थापित ब्रह्मो ब्वायज स्कूल में हुई. प्रेसीडेंसी कालेज से भौतिकी में आनर्स करने के बाद वे उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए लंदन चले गए. वहां उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भौतिकी और गणित विषयों से डिग्री प्राप्त की. ये एकमात्र छात्र थे जिनको भौतिकी में पहला स्थान प्राप्त हुआ था. उन्होंने अपने शिक्षक के कहने पर बायोमेट्रिका नामक किताब पढ़ी. इसे पढ़ने के बाद उनका रुझान सांख्यिकी की ओर हुआ. उन्होंने इस दिशा में सबसे पहला काम कालेज के परीक्षा परिणामों का साख्यिकीय माध्यम से विश्लेषण करने का किया. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. इसके बाद महालनोबिस ने जुलोजिकल एंड एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया के निदेशक नेल्सन अन्नाडेल के कहने पर कोलकाता के ऐंग्लो इंडियंस के बारे में एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया. इस विश्लेषण का जो परिणाम आया वह भारत में सांख्यिकी का पहला शोध-पत्र कहा जाता है.


प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा शुरु किया गया सैंपल सर्वे है. जिसके आधार पर आज बड़ी-बड़ी नीतियां और योजनाएं बनाई जा रही हैं. उनके द्वारा सुझाई गयी एक सांख्यिकीय माप को महालनोबिस दूरी के नाम से जाना जाता है. वे चाहते थे कि सांख्यिकी का उपयोग देशहित में हो. इसी कारण से उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाई. 17 दिसंबर 1931 को उनका सपना साकार हुआ जबकि कोलकाता में भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की गई. आज कोलकाता के अलावा इस संस्थान की शाखाएं दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चेन्नई, गिरिडीह सहित देश के दस स्थानों में हैं. सन 1959 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया. प्रोफेसर महालनोबिस को 1957 में अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का सम्मानित अध्यक्ष बनाया गया. भारत सरकार ने 1959 में प्रोफेसर प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस को पद्म विभूषण से सम्मानित किया. उन्हें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा 1944 में वेलडन मेडल पुरस्कार दिया गया था तथा 1945 में रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया गया था.


प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस एक दूरद्रष्टा भी थे. उन्हें विज्ञान में ब्यूरोक्रेसी पसंद नहीं थी. उन्हें अपने संस्थान से काफ़ी लगाव था और वे इसे एक स्वतंत्र संस्था के रूप में देखना चाहते थे. जब 1971 में इस संस्थान से जुड़े अधिकांश लोगों ने सरकार के साथ जाने का फैसला किया तो उन्हें आंतरिक कष्ट हुआ. वे इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और 28 जून, 1972 को उनका देहांत हो गया. आर्थिक योजना और सांख्‍यि‍की विकास के क्षेत्र में प्रशांत चन्‍द्र महालनोबिस के उल्‍लेखनीय योगदान के सम्‍मान में भारत सरकार उनके जन्‍मदिन 29 जून को प्रतिवर्ष सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाती है. इसका उद्देश्‍य सामाजिक-आर्थिक नियोजन और नीति निर्धारण में प्रो. महालनोबिस की भूमिका के बारे में जनता में, विशेषकर युवा पीढ़ी में जागरूकता लाना तथा उन्‍हें प्रेरित करना है.

11 June 2017

हताश विपक्ष की कुंठित प्रतिक्रिया

शून्य को भरने के लिए समाज में सलाह दी जाती है सकारात्मक सोच की, सार्थक कार्य करने की. इसके उलट राजनीति में शून्य को भरने के लिए विशुद्ध राजनैतिक हथकंडे अपनाये जाते हैं. इन हथकंडों को अपनाने में खून भी बहाना पड़े, आग भी लगानी पड़े, झूठ का सहारा लेना पड़े तो भी कम है. वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में केंद्र से विपक्ष लगभग शून्य की स्थिति में है. वर्तमान लोकसभा में गिने-चुने दलों को अवसर मिल पाया कि उनके प्रतिनिधि सदन में बैठ सकें. केन्द्रीय सत्ता के कार्यों और उसके प्रतिनिधियों के चाल-चलन में खोट न निकाल पाने के कारण, विगत तीन वर्षों में किसी भी तरह के घोटाले न निकाल पाने के कारण, केन्द्रीय नेतृत्व के कार्यों से जनता को असंतुष्ट न देख पाने के कारण विपक्षी दलों में हताशा का माहौल है. इसको महज ऐसे समझा जा सकता है कि देश भर में जबरदस्त विरोधी रहे विपक्षी दल भी आपस में गलबहियाँ करते दिख रहे हैं. ये गलबहियाँ समाजहित में नहीं हैं, देश की भलाई के लिए नहीं हैं, राजनैतिक सुधार के लिए नहीं हैं वरन केंद्र की सरकार को हटाने के लिए हैं. इन लोगों को खुद से एक सवाल करना चाहिए कि आखिर केंद्र की सरकार ने ऐसे कौन से काम किये हैं जो जिसको लेकर उसे हटाने की बात की जाये? देखा जाये तो विपक्षियों के पास वर्तमान में कोई मुद्दा नहीं है इसलिए उनके द्वारा ऐसे कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है जिसके चलते देश में, समाज में तनाव का माहौल बने और लोगों में केंद्र के प्रति भाजपा के प्रति नफरत पैदा हो. विपक्षियों की इस सोच के पीछे का मूल कारण दो वर्षों में संपन्न होने वाले लोकसभा चुनाव हैं. उनकी सोच है कि समाज में इस तरह के तनाव पैदा करने से केंद्र के प्रति, भाजपा के प्रति नाराजगी पैदा होगी जो विपक्षियों के लिए लाभदायक रहेगी.

विपक्षियों की इसी नकारात्मक सोच का परिणाम है कि केरल में कांग्रेसियों द्वारा खुलेआम एक गाय को काट डाला गया, उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में चलाया गया. इसी तरह खबर आई है कि विधायकों ने अपनी बैठक के पहले बीफ खाकर केंद्र सरकार के पशुवध सम्बन्धी नियम का विरोध जताया है. बिना सम्पूर्ण नियमावली को देखे-पढ़े सिर्फ विरोध करने के नाम पर विरोध की राजनीति ने ऐसे कृत्यों को अंजाम दिया. कुछ इसी तरह का कार्य आजकल मध्य प्रदेश में देखने को मिल रहा है. जहाँ किसानों के आन्दोलन के नाम पर हताश-निराश विपक्ष अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर है. किसानों की कर्जमाफी के नामपर जिस तरह का उपद्रव पिछले कुछ दिनों से प्रदेश की सड़कों पर दिख रहा है वह किसी भी रूप में किसानों का आन्दोलन नहीं लग रहा है. कारों, बसों को जला देना, यात्रियों से भरी बस में तोड़फोड़ करना आदि लक्षण नहीं हैं किसी भी किसान आन्दोलन के. इसका प्रमाण भी वो वीडियो दे रहा है जिसमें एक विधायक को थाने में आग लगा देने की बात कही जा रही है. असल में देश भर में जहाँ-जहाँ विपक्षी कमजोर हैं अथवा भाजपा तेजी से उठ रही है वहाँ-वहाँ विपक्षियों की एक सोची-समझी साजिश के द्वारा ऐसे कार्य किये जा रहे हैं.

कार्यों में नकारात्मकता खोजने में विफल विपक्ष, घोटाले-विहीन सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि देख कर घबराता विपक्ष, सरकार के राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यों में सफलता देखकर हताश होते विपक्ष के पास कोई मुद्दा शेष भी नहीं है जिसके आधार पर वे जनता के बीच जा सकें. इसके चलते वे सिवाय नफरत, गुंडागर्दी फ़ैलाने के कुछ और नहीं कर पा रहे हैं, न कुछ और सोच पा रहे हैं. विपक्ष का ये रवैया किसी भी रूप में न तो भाजपा के लिए घातक है और न ही केन्द्रीय सत्ता के लिए. यदि ये रवैया घातक है तो सिर्फ समाज के लिए. इस तरह के कृत्य से समाज में वैमनष्यता बढ़ने का खतरा रहता है आपसी तालमेल समाप्त होने की शंका उभरती है. विपक्षियों को आपस में गलबहियाँ करते समय विचार करना होगा कि उनका गठबंधन काहे के लिए हो रहा है? क्या वाकई वे समाज के लिए एक होना चाहते हैं? क्या उनके एक होने का मकसद सिर्फ सत्ता पाना है? क्या समाज को वाकई केन्द्रीय नेतृत्व से लाभ नहीं मिल रहा है? बहरहाल वर्तमान स्थिति में केन्द्रीय सत्ता को तथा भाजपानीत प्रादेशिक सरकारों को सजग रहने की आवश्यकता है क्योंकि विपक्षी हताशा-निराशा में माहौल बिगाड़ने के अलावा कोई और काम करेंगे नहीं. उनकी गिरती स्थिति का सूचक सिर्फ इतना है कि विपक्षी अब सरकार के कार्यों की बजाय उसके बयानों में कमियाँ खोजने का काम करने लगे हैं. जब देश का, प्रदेश का विपक्ष इतना कमजोर हो जाये कि वो कार्यों के बजाय शब्दों पर राजनीति करने लगे, किसी और के नाम पर अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारने लगे, समाजहित की जगह पर समाज में विध्वंस फ़ैलाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि वातावरण विषाक्त होने वाला है. 

05 June 2017

पॉलीथीन का नकार, पर्यावरण का बचाव

वर्तमान विकास के दौर में समाज पर्यावरण संकट के दौर से भी गुजर रहा है. वास्तविकता यह है कि इस संकट को खुद मनुष्य ने उत्पन्न किया है. इसके लिए किसी शक्ति को, किसी परमात्मा को, किसी प्राकृतिक आपदा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है. मनुष्यों के द्वारा उत्पन्न किया गया पर्यावरण संकट आज मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में आया है. विकास की अंधी दौड़ में इन्सान ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों को विस्मृत कर दिया है. मानव ने आदिमानव से महामानव बनने के क्रम में प्रकृति को इस बात की परवाह किये बिना क्षतिग्रस्त किया है कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी. स्व-विकास में लिप्त, स्वार्थ में लिप्त इंसान के लिए सोचने का भी समय नहीं कि जिस पर्यावरण में वह साँस ले रहा है, जिस प्राकृतिक वातावरण में वह जीवनयापन कर रहा है उसको नष्ट कर देने से सर्वाधिक नुकसान वह स्वयं का ही कर रहा है. दुष्परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट सामने आया है.


सामान्य रूप से पर्यावरण का पारिभाषिक सन्दर्भ संस्कृत के परि उपसर्ग में आवरण शब्द को सम्बद्ध करने से लगाया जाता है अर्थात ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति, जीवधारी, वनस्पति आदि को चारों तरफ से आवृत्त किये हो. पर्यावरण के सामान्य अर्थ से इतर यदि इसका सन्दर्भ निकालने का प्रयास किया जाये तो ज्ञात होता है वर्तमान में जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात हम अपने आसपास देख-महसूस कर रहे हैं, वो सभी पर्यावरण है. हमारे आसपास, हमारे लिए जीवन की एक सम्पूर्ण व्यवस्था का निर्माण करता है, उसे हम पर्यावरण कहते हैं. इसमें सजीव-निर्जीव वस्तुएँ, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरती, आकाश आदि सभी समाहित किये जाते हैं. जल, धरती, आकाश, वायु आदि सभी के साथ वर्तमान में उसका व्यवहार दोस्ताना नहीं रह गया है वरन इनका अधिक से अधिक उपभोग करने की मानसिकता के साथ मनुष्य काम कर रहा है.

विकास के नाम पर शनैः-शनैः प्रकृति को क्षतिग्रस्त करके पर्यावरण में असंतुलन पैदा किया जा रहा है. सुख-समृद्धि के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी क़दमों के कारण प्रकृति में जबरदस्त असंतुलन देखने को मिल रहा है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. जल, वायु, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषण से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन मानव जीवन के साथ-साथ वन्य प्राणियों के, वनस्पतियों को खतरा पैदा कर रहा है. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. ऐसे में इनसे बचाव के तरीके, इनकी रोकथाम के प्रयासों, प्रदूषण को कम करने पर विचार, पर्यावरण संतुलन बनाये जाने सम्बन्धी प्रयासों, प्रदूषण दूर करने-कम करने संबंधी क़दमों आदि की चर्चा अत्यावश्यक तो है ही, उनको अमल में लाया जाना उससे भी ज्यादा आवश्यक है.


इसमें भी हम देखते हैं कि सर्वाधिक नुकसान पॉलीथीन से होता समझ आ रहा है, दिख भी रहा है. जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें पाली एथीलीन होती है जो एथिलीन गैस बनाती है. इसमें पालीयूरोथेन नामक रसायन के अतिरिक्त पालीविनायल क्लोराइड (पीवीसी) भी पाया जाता है. पॉलीथीन हो या कोई भी प्लास्टिक, उसमें पाये जाने वाले इन रसायनों को नष्ट करना लगभग असंभव ही होता है क्योंकि प्लास्टिक या पॉलीथीन को जमीन में गाड़ने, जलाने, पानी में बहाने अथवा किसी अन्य तरीके से नष्ट करने से भी इसको न तो समाप्त किया जा सकता है और न ही इसमें शामिल रसायन के दुष्प्रभाव को मिटाया जा सकता है. यदि इसे जलाया जाये तो इसमें शामिल रसायन के तत्व वायुमंडल में धुंए के रूप में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं. यदि इसको जमीन में दबा दिया जाये तो भीतर की गर्मी, मृदा-तत्त्वों से संक्रिया करके ये रसायन जहरीली गैस पैदा करते हैं, इससे भूमि के अन्दर विस्फोट की आशंका पैदा हो जाती है. पॉलीथीन को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस धुंए के रूप में वायुमंडल से मिलकर ओजोन परत को नष्ट करती है. इसके साथ-साथ पॉलीथीन को जमीन में गाड़ देना भी कारगर अथवा उचित उपाय नहीं है क्योंकि यह प्राकृतिक ढंग से अपघटित नहीं होता है इससे मृदा तो प्रदूषित होती ही है साथ ही ये भूमिगत जल को भी प्रदूषित करती है. इसके साथ-साथ जानवरों द्वारा पॉलीथीन को खा लेने के कारण ये उनकी मृत्यु का कारक बनती है.

ये जानते-समझते हुए भी बहुतायत में पॉलीथीन का उपयोग हो रहा है. यद्यपि केन्द्रीय सरकार ने रिसाइक्लड, प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर एण्ड यूसेज रूल्स के अन्तर्गत 1999 में 20 माइक्रोन से कम मोटाई के रंगयुक्त प्लास्टिक बैग के प्रयोग तथा उनके विनिर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध वर्तमान में सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गए हैं. इसका मूल कारण पॉलीथीन बैग की मोटाई की जांच करने की तकनीक की अपर्याप्तता है. ऐसे में पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को रोकने का सर्वाधिक सुगम उपाय उसके पूर्ण प्रतिबन्ध का ही बचता है. पॉलीथीन के द्वारा उत्पन्न वर्तमान समस्या और भावी संकट को देखते हुए नागरिकों को स्वयं में जागरूक होना पड़ेगा. कोई भी सरकार नियम बना सकती है, अभियान का सञ्चालन कर सकती है किन्तु उसे सफलता के द्वार तक ले जाने का काम आम नागरिक का ही होता है. इसके लिए उनके द्वारा दैनिक उपयोग में प्रयोग के लिए कागज, कपड़े और जूट के थैलों का उपयोग किया जाना चाहिए. नागरिकों को स्वयं भी जागरूक होकर दूसरों को भी पॉलीथीन के उपयोग करने से रोकना होगा. हालाँकि अभी भी कुछ सामानों, दूध की थैली, पैकिंग वाले सामानों आदि के लिए सरकार ने पॉलीथीन के प्रयोग की छूट दे रखी है, इसके लिए नागरिकों को सजग रहने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे उत्पादों के उपयोग के बाद पॉलीथीन को अन्यत्र, खुला फेंकने के स्थान पर किसी रिसाइकिल स्टोर पर अथवा निश्चित स्थान पर जमा करवाना चाहिए. ये बात हम सबको स्मरण रखनी होगी कि सरकारी स्तर पर पॉलीथीन पर लगाया गया प्रतिबन्ध कोई राजनैतिक कदम नहीं वरन हम नागरिकों के, हमारी भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए उठाया गया कदम है. इसको कारगर उसी स्थिति में किया जा सकेगा, जबकि हम खुद जागरूक, सजग, सकारात्मक रूप से इस पहल में अपने प्रयासों को जोड़ देंगे.


वर्तमान जीवनशैली को, व्यापारिक-वाणिज्यिक स्थिति को, कल-कारखानों-उद्योगों पर मानवीय उपलब्धता, मानवीय रहन-सहन के तौर-तरीकों आदि के चलते ये कल्पना ही लगता है कि सभी लोग पूर्णरूप से पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं किन्तु ये कदापि असंभव नहीं कि एक-एक व्यक्ति खुद को सुधारने का काम कर ले तो पर्यावरण संकट को दूर न किया जा सके. पर्यावरण संकट से निपटने में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का स्वयं के प्रति ईमानदार न होना ही है और जब तक इन्सान अपने प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करेगा, तब तक इस तरह के अत्यावश्यक कार्यों में समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी. इस सम्बन्ध में मनुष्य को ही समाधानात्मक कदम उठाने होंगे. इससे भले ही समस्या पूर्ण रूप से समाप्त न हो पर बहुत हद तक इससे निपटने में सहायता मिल जाएगी.  

04 June 2017

तोहफे में जीत न दे आना उनको

पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध सुधारने की कवायद तबसे चलनी शुरू हो गई थी, जबसे उसका जन्म हुआ था. आये दिन किसी न किसी कदम के द्वारा ऐसा होता दिखता है. सम्बन्ध सुधार के दौर में पाकिस्तान की तरफ से बारम्बार इसको बाधित करने का उपक्रम भी चलाया जाता रहा है. एक तरह शांति-वार्ताएं चलती हैं तो दूसरी तरफ अशांति की हरकतें की जाने लगती हैं. पाकिस्तान का अपना इतिहास रहा है नित्य ही भारत के लिए समस्याएँ पैदा करने का. कभी युद्ध के द्वारा, कभी घुसपैठ के द्वारा, कभी आतंकी हमलों के द्वारा, कभी संयुक्त राष्ट्र में बेवजह कश्मीर के मुद्दे को उठाने के द्वारा.


पाकिस्तान की बात ही क्या की जाये, यदि अपने देश के इन नेताओं की, जिम्मेवार लोगों की ही बात की जाये तो ताजा घटनाक्रम में ही भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच को ही लिया जा सकता है. दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध सहज हों, मधुर हों इसको स्वीकार करने वाले पर्याप्त संख्या में हमारे देश में मौजूद हैं. इसके साथ ही ऐसे लोग भी बहुत हैं जो खेलों के द्वारा, सांस्कृतिक वातावरण के द्वारा, साहित्य-कला के द्वारा दोनों देशों के संबंधों-रिश्तों को सुधारने की वकालत करते हैं. हालाँकि समस्त देशवासी ऐसा शत-प्रतिशत रूप से नहीं स्वीकारते हैं. बहुत से नागरिकों ने दोनों देशों के बीच क्रिकेट मैच का एकसुर से विरोध किया है. सोचने की बात है कि एक तरफ देश में सैनिकों के साथ-साथ अनेक मासूम, निर्दोष नागरिकों को पाकिस्तानी आतंक के चलते अपनी जान गँवानी पड़ रही है वहीं दूसरी तरफ सम्बन्ध सुधारने की कवायद में मगन रहने वाले मैच खेलने में लगे हुए हैं. ये अत्यंत शर्मनाक स्थिति तो है ही साथ ही अत्यंत अपमानजनक भी है. ये अपमान उन तमाम शहीदों का है जो आतंकी हमले का शिकार हुए; ये अपमान उन सैनिकों का है जो आये दिन सीमा पर पाकिस्तानी आतंकियों का, पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का सामना करते हैं.

आज सम्पूर्ण विश्व इस बात को स्वीकारने लगा है कि भारत देश में आतंकी घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है और इससे भी कोई इंकार नहीं करता है कि भारतीय सेना महज इस कारण खामोश रही है कि हमारे देश की सरकारों ने सदैव शांति-वार्ताओं के द्वारा हल निकालना चाहा है. सेना की ख़ामोशी को कमजोरी समझने की भूल न तो पाकिस्तान को करनी चाहिए और न ही भारत में बैठे पाकिस्तान-प्रेमियों को ऐसा करने की छूट है. क्रिकेट हो या फिर कोई और मसला सभी में देश की अखंडता का, देश की सेना के मनोबल का, देशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाना अनिवार्य होना चाहिए.


अंत में अपनी बात क्योंकि मैच तो रद्द होने से रहा. क्रिकेट का स्व-घोषित महामुकाबला होने वाला है. बहरहाल मैच का परिणाम कुछ भी हो, हमें एक बात का विशेष ध्यान रखना है कि जीतने अथवा हारने वाला देश नहीं होगा बल्कि किसी देश की क्रिकेट टीम जीतेगी और किसी देश की टीम मैच हारेगी. यह सुनना स्वयं में कितना खराब लगता है कि भारत हारा. हालांकि इस तरह की गलती स्वयं हमसे भी हो जाती है पर हमें ही इस बात का ध्यान रखना है कि गलती बार-बार न हो. आप स्वयं देखिये कई बार हमारी टीम बहुत बुरी तरह से हारी है तो मीडिया ने लिख दिया कि फलां देश ने भारत को बुरी तरह से रौंदा. हमारी क्रिकेट टीम हार सकती है, जीत भी सकती है पर हमारा देश भारत कभी नहीं हार सकता, उसे तो बस जीतना है और जीतना ही है.


एक अन्तिम बात कि हमें तो डर लग रहा है कि कहीं पाकिस्तान से दोस्ती दिखाने के चक्कर में हमारी टीम उनको जीत का तोहफा न दे डाले. दोनों देशों के इतने बड़े-बड़े हुक्मरान बैठे होंगे और हमारे देश में वैसे भी पाकिस्तान के सम्बन्ध में बहुत ही कोमल दिल रहता है. कहीं इसी कोमलता के, सहिष्णुता के दर्शन मैच में न हो जायें?

27 May 2017

तीन वर्ष के मोदी

राष्ट्रीय राजनीति का अनुभव न होने के बाद भी जिस तेजी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल राष्ट्रीय राजनीति में वरन अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अपने आपको स्थापित किया है वह प्रशंसनीय है. गुजरात मुख्यमंत्रित्व काल में उनकी छवि गुजरात दंगे और मुस्लिम विरोधी प्रचारित होने के चलते अमेरिका द्वारा उनको वीजा देने से इंकार कर दिया गया था. बाद में न सिर्फ अमेरिका ने वरन वैश्विक समुदाय ने मोदी जी की राजनैतिक सूझबूझ का लोहा माना और उनके माध्यम से देश के साथ मधुर संबंधों को मधुरतम बनाया. तीन वर्ष पहले प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते समय नरेन्द्र मोदी के सामने अनेकानेक चुनौतियाँ थीं. देश में अनेक समस्याओं के साथ-साथ विपक्षी बौखलाहट वाली भी एक समस्या प्रमुख थी. देश भर में छाई नमो लहर ने शेष दलों को जैसे हाशिये पर खड़ा कर दिया था. जाति, धर्म के नाम पर चलने वाली राजनीति को बहुत हद तक मतदाताओं ने आइना दिखा दिया था. ऐसे ने विपक्षियों में बौखलाहट आना स्वाभाविक था. इस बौखलाहट से निपटते हुए मोदी जी के सामने उसी गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करना था, जिसके सहारे वे लगातार गुजरात की राजनीति में अपना सिक्का जमाये हुए थे. भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी को दूर करना, कार्यप्रणाली को सही करना, जीवनशैली को सुचारू बनाना, हाशिये पर खड़े लोगों के हितार्थ काम करना, अल्पसंख्यकों के मन से नकारात्मकता को दूर करना, देश के चारित्रिक बदलाव की पहल करना आदि ऐसे काम थे जो सहजता से संपन्न होने वाले नहीं थे.


चुनौतियों के साथ काम करना संभवतः मोदी जी के साथ-साथ परछाईं की तरह लगा रहता है. राज्य की राजनीति में इसने कभी पीछा नहीं छोड़ा और राष्ट्रीय राजनीति में भी चुनौतियाँ साथ में आईं. उन्होंने इन चुनौतियों के साथ बड़ी ही सहजता से आगे बढ़ते हुए देश को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का संकल्प लिया हुआ था. इसी संकल्प के जरिये वे संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा भारतीय विरासत योग को अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने में सफल रहे. इसी तरह उन्होने देश के भीतर वर्षों से सुसुप्तावस्था में पड़े स्वच्छता विषय को जागृत किया. लाल किले से उनका स्वच्छता सम्बन्धी अभियान लगातार आगे बढ़ता नजर आ रहा है. मोदी जी की दृष्टि में जहाँ एक तरफ औद्योगिक विकास था वहीं आम जनमानस के विकास की बात भी वे करने में लगे थे. औद्योगिक घरानों को विशेष लाभ देने के आरोपों के बीच उन्होंने जनधन योजना के द्वारा समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को देश की मुख्य विकासधारा से जोड़ने का काम किया. स्वच्छता को आधार बनाकर मोदी जी ने जिस तरह से शौचालय निर्माण का अभियान गाँव-गाँव तक पहुँचा दिया है वैसा विगत के वर्षों में देखने को कदापि नहीं मिला था. केंद्र सरकार ने उनके नेतृत्व में दिखाया कि वर्तमान सरकार जन-जन की सरकार है. जन-धन योजना, सामाजिक सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, उज्ज्वला योजना, बैंक खातों में सब्सिडी का आना, रसोई गैस की सब्सिडी का स्वेच्छा से त्याग करना आदि वे उदहारण हैं जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाते हैं. इन योजनाओं के पीछे का मूल उद्देश्य समाज में आदमी-आदमी के बीच के फर्क को कम करना, मिटाना रहा है. ऐसी योजनाओं के द्वारा सरकार ने आमजन को जोड़ने का काम किया, स्टार्टअप जैसे कार्यक्रम चलाकर देश के युवाओं को नई दिशा दी है, मेक इन इण्डिया के द्वारा विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है.


इसके बाद भी अभी चुनौतियाँ बहुत सारी हैं. तीन सालों में मोदी जी ने अभी जनमानस में विश्वास जमाया है. देश भर में फैली अव्यवस्था को दूर कर पाने में वे अभी सफल होते नहीं दिखे हैं. सबका साथ, सबका विकास के नारे को यदि वास्तविकता में लागू करना है तो मोदी जी को आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे. ऐसे परिवर्तन करने की क्षमता उनमें है भी. ऐसा उन्होंने नोटबंदी करके दिखाया है, पाकिस्तान के प्रति कठोर रवैया अपनाकर प्रदर्शित किया है. इसके बाद भी उन्हें अभी और कड़े फैसले लेने की जरूरत है. कश्मीर समस्या, नक्सलवाद, कानून व्यवस्था, चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, राजनैतिक वैमनष्यता आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनसे पार पाने की जरूरत है. विगत तीन वर्षों में मोदी जी ने जिस तरह से अपने कार्यों को, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया है उससे उनकी मुस्लिम विरोधी छवि कम हुई है. अल्पसंख्यकों में भी विश्वास जगा है. इसी विश्वास के चलते ही मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक जैसे संवेदनशील विषय पर मोदी जी का साथ चाहा है. देखा जाये तो विगत के कई-कई वर्षों की अनियमितता ने देश में कार्यशैली को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. लोगों की सोच को भी नकारात्मक बनाया है. किसी भी काम के पीछे राजनैतिक दलों का लामबंद होना समझ में आता है किन्तु आम जनमानस को समझना होगा कि उसके लिए क्या सही है, क्या गलत है. मोदी सरकार अभी भी जनमानस की समस्याओं को सुलझाने के साथ-साथ राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों से जूझने के साथ-साथ मीडिया के नकारात्मक प्रचार-प्रसार से भी दो-चार हो रही है. ऐसे में आने वाले दो साल मोदी सरकार के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होंगे. उन्हें न केवल जनता की समस्याओं को दूर करना है वरन देश के भीतर बैठे देश-विरोधियों की हरकतों को भी बढ़ने से रोकना है.

20 May 2017

अफवाह के चंगुल से बचें

किसी समय अंग्रेजों ने हमारे देश को मदारी, जमूरों का देश कहा था. सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश को पूरी तरह से लूटने के बाद गरीब बना दिए गए देशवासियों को अंग्रेज शासक कुछ भी समझने को आज़ाद थे. देश गुलाम था, देशवासी गुलाम थे ऐसे में वे यहाँ के नागरिकों को, देश को कुछ भी कह सकते थे. लम्बे संघर्ष के बाद, हजारों जाने-अनजाने वीर-वीरांगनाओं की शहादत रंग लाई और देश आज़ाद हुआ. अंग्रेज शासक चले गए किन्तु जाते-जाते वे अपनी मानसिकता का गहरा बीजारोपण यहाँ कर गए. जिसका दुष्परिणाम ये हुआ कि आज़ादी के बाद भी देश को जमूरा, मदारियों, नौटंकीबाजों का देश समझने वालों की कमी नहीं रही. गुलाम देश के अंग्रेजी शासकों की तर्ज़ पर आज़ाद देश के स्थानीय अंग्रेजों ने भी समय-समय पर देशवासियों के लिए अपनी-अपनी परिभाषायें निर्मित की. किसी ने बेवक़ूफ़ कहा, किसी ने कैटल क्लास बताया, किसी ने कुछ, किसी ने कुछ. इन परिभाषाओं को पुष्ट करने का काम समय-समय पर समाज में फैलती तमाम बातों ने भी किया है. इसमें भी सदैव से पढ़े-लिखे लोगों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है. कुछ दिनों पहले EVM के हैक किये जाने की अफवाह उड़ी. उसके भी पहले नोटबंदी के समय नए नोट को लेकर अनेक तरह की अफवाह फैलाई गईं. फोटोशॉप करके भी फोटो के द्वारा अफवाह फ़ैलाने का काम पढ़े-लिखे लोगों का ही होता है. अभी देखिये, एक पढ़े-लिखे विद्वान माने जाने वाले वकील साहब तीन तलाक जैसी नितांत अव्यवहारिक व्यवस्था की तुलना आस्था से करने बैठ गए. कुछ सालों पहले यही वकील साहब अदालत में हलफनामा देकर बता रहे थे कि जिस श्रीराम के प्रति हिन्दू आस्था व्यक्त करता है वे काल्पनिक हैं. 


इस अव्यावहारिक तुलनात्मक उदाहरण के साथ ही एक और घटनाक्रम दो-तीन दिन से बहुत तेजी से सबके बीच चलने में लगा है. इसमें लोगों को बताया-समझाया जा रहा है कि एक नौ अंकों के मोबाइल नंबर से फोन आएगा और उसे रिसीव करते ही मोबाइल फट जायेगा. हालाँकि अभी तक कहाँ-कहाँ मोबाइल फटा इसकी कोई जानकारी नहीं, इसके बाद भी इस मैसेज को लगातार-बराबर शेयर किया जा रहा है. ऐसे मैसेज समय-समय पर सोशल मीडिया की शान में चार चाँद तो लगाते ही हैं देशवासियों के सामान्य से ज्ञान पर भी रौशनी डालते हैं. कभी नमक की कमी होने लगती है, कभी कॉस्मिक किरणें रात को बारह बजे पृथ्वी के पास से निकलने लगेंगी, कभी कोई उल्का पिंड धरती पर गिरने की तैयारी करने लगता है. ऐसे में याद आता है सन 1980 के आसपास का समय जबकि स्काई लैब के गिरने की अफवाह बहुत तेजी से फैली थी. उस समय लोगों में मरने के डर से, सब खो जाने के भय से अफरातफरी मच गई थी. समझा जा सकता है कि उस समय तकनीक का, संचार साधनों का अभाव था किन्तु अब तो प्रत्येक व्यक्ति तकनीकी संपन्न है, संचार साधनों के सहारे समूचे विश्व से जुड़ा है. ऐसे में किसी भी तरह की अफवाह पर समाज के बहुत बड़े वर्ग का चिंताग्रस्त हो जाना अंग्रेजों और देशी-अंग्रेजों द्वारा यहाँ के बहुतायत नागरिकों के लिए कहे गए वचनों को सिद्ध करता है.


उस समय जबकि लोगों के पास शिक्षा के साधन कम थे, लोगों का परिचय तकनीक से दूर-दूर तक नहीं था तब उनका दिग्भ्रमित हो जाना स्वाभाविक था. तब उनके पास संचार के साधन भी नहीं थे, जो थे भी वे इतने उन्नत नहीं थे कि पल में सुदूर क्षेत्र की खबर का आदान-प्रदान कर सकें. ऐसी विषम स्थितियों में नागरिकों का अफवाहों के चंगुल में फँस जाना समझ आता है. आज जबकि तकनीकी दुनिया बहुत समर्थ है; आज जबकि लगभग हर हाथ में संचार साधन की उन्नत तकनीक है; आज जबकि एक पल में देश की ही नहीं वरन विदेश की किसी भी खबर को सामने खड़ा देख सकते हैं तब भी समाज का बहुत बड़ा वर्ग अफवाहों का शिकार बन जाता है, जालसाजी का शिकार बन जाता है. ऐसे समय में ये समझ से परे है कि आखिर ऐसा क्यों हो जाता है? आखिर ऐसा होने में दोषी कौन होता है? जो अफवाह फैलाकर, जालसाजी करके अपना उल्लू सीधा करता है या फिर वो जो इसका शिकार बन जाता है? आज जिस तेजी से तकनीक का विकास हुआ है, उसी तेजी से इसका दुरुपयोग करने वालों की संख्या में भी वृद्धि हुई है. तकनीक की आड़ लेकर कभी अफवाह के द्वारा लोगों को ठगने का काम किया जाता है तो कभी इसी तकनीक के सहारे अफवाह फैलाकर किसी लोभ-लालच का शिकार बनाया जाता है. आवश्यकता सजग रहने की है, सचेत रहने की है. तकनीकी रूप से सक्षम होने का अर्थ सोशल मीडिया में हस्तक्षेप बढ़ जाना नहीं है; तकनीकी ज्ञान का अर्थ किसी भी रूप में मोबाइल पर समूची दुनिया को कैद समझ लेना नहीं है वरन तकनीकी रूप से साक्षर होने का अर्थ है कि अपने आसपास होने वाले किसी भी घटनाक्रम के बारे में सही-सही जानकारी रखना. किसी भी अफवाह, घटनाक्रम के सामने आने टार उसकी सत्यता, उसकी प्रामाणिकता को पता करना. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम सभी पढ़े-लिखे निरक्षर हैं. यदि ऐसा हम नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम आये दिन खुद को ठगी का शिकार बनवा रहे हैं. यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम खुद को, अपने वर्तमान को, भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं. खुद को, परिवार को, समाज को, देश को खतरों से बचाने के लिए अफवाहों से बचने, उनके प्रचार-प्रसार से बचने, उनकी सत्यता प्रमाणित करने की आवश्यकता है.