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07 May 2013

दूषित परम्पराएँ लोकतंत्र के लिए आत्मघाती कदम



केंद्र सरकार जिस तरह से अपने भ्रष्ट मंत्रियों का बचाव करने में लगी है वह देश के लिए चिंता का विषय है. विद्रूपता ये है कि न केवल मंत्री बल्कि तमाम मंत्रालयों, विभागों में बैठे शीर्षस्थ पदाधिकारी भी मनमाने ढंग से अपने मंत्रियों की, अपनी कारगुजारियों को छिपाने का काम कर रहे हैं. बंसल के भांजे के रिश्वत काण्ड के साथ-साथ कोयला घोटाले की अनियमितता के सामने आने ने भविष्य की स्थिति की भयावहता को ही प्रकट किया है. बंसल के रिश्वत कांड मामले में सरकार की तरफ से जिस बेहयाई के साथ सीना ठोंक कर उनका बचाव किया गया ठीक वही स्थिति उसकी तरफ से कानून मंत्री को लेकर भी दर्शाई गई है. ये चिंता का विषय है कि किस तरह शीर्षस्थ पदाधिकारी, मंत्री अपने घोटालों को छिपाने के लिए, अपने आपको बचाने के लिए खुलेआम झूठ का सहारा लेते हैं. 
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देश में कांग्रेसनीत सरकार की तरफ से हर बार कोई न कोई नई परंपरा को शुरू किया जाता है और इसका दुष्परिणाम भविष्य में देश को, जनता को भुगतना पड़ता है. इस बात को देश की आज़ादी के समय पाकिस्तान और चीन के प्रति बरते गए नरम व्यवहार से समझा जा सकता है. कुछ इसी तरह की दूषित परम्परा की नींव वर्तमान केंद्र सरकार की तरफ से डाली गई है. कोयला घोटाला या फिर वर्तमान रिश्वत काण्ड अपने आपमें कोई पहला मामला नहीं है जिसमे केन्द्रीय मंत्रियों के नाम सामने आये हैं. इससे पहले भी वर्तमान सरकार में ही घोटालों की जबरदस्त भरमार देखने को मिली है. दूषित परम्परा इस रूप में डाली जा रही है कि बजाय कोई ठोस कार्यवाही करने के सरकार की तरफ से भ्रष्ट मंत्रियों, नेताओं का जबरदस्त बचाव किया गया. इस तरह के क़दमों का दुष्परिणाम भविष्य में देखने को मिलेगा जब आगामी लोकसभा के बाद बने मंत्री अपने पूर्वमंत्रियों का अनुगमन करते दिखेंगे. इसके अलावा सदन में बोलने के बाद वाकआउट करने की योजना एक बैठक में बन जाना, ऐसा न करने पर सभापति द्वारा उनको याद दिलाना, सदन में प्रायोजित हंगामा खड़ा करके संसद को स्थगित रखना, महत्वपूर्ण बिलों को विपक्ष की अनुपस्थिति में पारित करवा लेना, सरकार-सदन का रिमोट-कण्ट्रोल की तरह से चलते दिखना आदि-आदि ऐसी स्थितियां हैं को किसी भी रूप में भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए सुखद नहीं हैं.
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स्थिति की भयावहता को इस रूप में और भी समझा जाना चाहिए कि जब अपने कारनामों को छिपाने के लिए शीर्षस्थ मंत्री, पदाधिकारी उच्चतम न्यायालय से झूठ बोल सकते हैं तो फिर वे आम जनता के सामने सच कैसे आने देंगे. आज भी आम जनता के मध्य न्यायालयों के प्रति एक प्रकार का विश्वास कायम है और वो मानती-समझती है कि तमाम भ्रष्ट मंत्री, सरकारें कितने भी घोटाले कर लें किन्तु अदालतें उचित न्याय करेंगी. ये और बात है कि भ्रष्टाचार के मामलों में आज तक किसी मंत्री को जेल के अन्दर नहीं ही देखा है. कुछ दिनों की रस्मअदायगी सी करने के बाद ये भ्रष्ट मंत्री फिर सत्ता-सुख उठाने लगते हैं. वर्तमान सरकार में लगभग दर्ज़न भर मंत्री इस तरह की प्रस्थिति में दिखाई देते हैं. समझा जा सकता है कि जब सरकार अपने भ्रष्ट मंत्रियों का बचाव करने में लगी हो, सदन में भी हंगामा एक सोची-समझी प्रक्रिया के अंतर्गत होता हो, सरकार और सदन किसी और के इशारे पर चलते दिख रहे हों, जहाँ वाकआउट करना बैठक के माध्यम से पूर्वनिर्धारित हो, जहाँ हंगामा करके सदन को स्थगित रखना एक तरह की रणनीति हो, जहाँ विदेशी घुसपैठ को भी सहजता से लेकर जनता के सामने झूठे तथ्य पेश किये जाते हों तो लोकतंत्र पर मंडराते खतरे का आभास किया जा सकता है. दूषित परम्पराओं, गलत क्रियाविधि का स्थापित होना, भ्रष्ट मंत्रियों-अधिकारियों का बचाव सरकार के लिए भले ही राहत के क्षण लेकर आता हो किन्तु देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए आत्मघाती कदम ही कहा जायेगा.

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