22 August 2017

रेलवे प्रशासन यात्रियों की सुरक्षा को समझे

मुजफ्फरनगर में एक और ट्रेन हादसा हुआ. इसके बाद वही सरकारी लीपापोती, वही जाँच के आदेश. हर ट्रेन दुर्घटना के पीछे आतंकवादी कनेक्शन नहीं होता और हर ट्रेन हादसे के पीछे ऐसे ही कनेक्शन को तलाश करने का अर्थ है कि सरकारी तंत्र अपनी नाकामयाबी को छिपाने की कोशिश कर रहा है. मुजफ्फरनगर में हुए हालाँकि हालिया कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में सरकारी तंत्र की तरफ से न तो आतंकी हाथ होने सम्बन्धी बयान आया और न ही उस दिशा में जाने जैसे कोई संकेत दिए गए. इस हादसे में प्रथम दृष्टया मानवीय चूक ही नजर आती है और हादसे के तुरंत बाद फौरी तौर पर कदम उठाते हुए सम्बंधित कर्मियों पर कार्यवाही भी कर दी गई है. इसके बाद भी कई सवाल हैं कि आखिर सम्बंधित रेलकर्मी अपनी जिम्मेवारी को समझते क्यों नहीं? आखिर हादसों के बाद निलम्बन, स्थानांतरण आदि के द्वारा कागजी खानापूरी कब तक की जाती रहेगी? रेलवे प्रशासन आखिर अपने यात्रियों की सुरक्षा के प्रति लापरवाह क्यों बना हुआ है?

ये ट्रेन दुर्घटना कोई पहली दुर्घटना नहीं है. अभी कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश के पुखरायाँ रेलवे स्टेशन के पास हुए भीषण हादसे में सैकड़ों लोगों की जान गई थी. उसके चंद दिनों बाद कानपूर के नजदीक रूरा रेलवे स्टेशन के पास भी ट्रेन पटरी से उतर कर पलट गई थी. शुक्र था भगवान का कि रूरा ट्रेन हादसे में बहुत जान-माल की क्षति नहीं हुई थी. यहाँ पुखरायाँ हादसे की जाँच में आतंकी कनेक्शन मिलने के सूत्र हासिल हुए हैं. उसके बाद पकडे गए कुछ आतंकियों ने उस हादसे के बारे में सबूत भी दिए थे लेकिन सभी ट्रेन हादसे आतंकी गतिविधियों के कारण नहीं हो रहे हैं. वर्तमान कलिंग-उत्कल ट्रेन हादसे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ट्रेन पटरी पर काम चल रहा था, जिसमें घनघोर दर्जे की लापरवाही की गई. जो कुछ घटनास्थल पर दिखाई दे रहा है उसको और उजागर करने का काम मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसे के बाद सामने आई वो ऑडियो क्लिप है जिसमें दो रेलवे कर्मचारियों की टेलीफोन पर हुई बातचीत है. इस बातचीत में ट्रेन दुर्घटना में लापरवाही के संकेत मिले हैं. बातचीत के आधार पर जैसा कि एक रेलवे कर्मचारी दूसरे से कह रहा है कि रेलवे ट्रैक के एक भाग पर वेल्डिंग का काम चल रहा था. लेकिन मजदूरों ने ट्रैक के टुकड़े को जोड़ा नहीं और इसे ढीला छोड़ दिया. क्रासिंग के पास गेट बंद था. ट्रैक का एक टुकड़ा लगाया नहीं जा सका था और जब उत्कल एक्सप्रेस पहुंची तो इसके कई कोच पटरी से उतर गए. इसके साथ ही यह भी कहा गया कि जिस लाइन पर काम चल रहा था, न तो उसे ठीक किया गया और न ही कोई झंडा या ट्रेन रोकने को कोई साइनबोर्ड लगाया गया. यह दुर्घटना लापरवाही की वजह से हुई. ऐसा लगता है कि सभी लोग निलंबित होंगे.

हर हादसे के बाद और सतर्कता से काम करने के निर्देश जारी कर दिए जाते हैं. जनता को आश्वासन और हताहतों को मुआवजा दे दिया जाता है. इतनी सी कार्यवाही के बाद रेलवे प्रशासन अपनी जिम्मेवारी को पूर्ण मान लेता है. ऐसे में क्या ये समझ लिया जाये कि रेलवे प्रशासन मान बैठा है कि ट्रेन हादसों को रोका नहीं जा सकता? आखिर एक तरफ देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखाए जा रहे हैं. ट्वीट के जरिये यात्रियों को मदद दिए जाने के रेल मंत्री सुरेश प्रभु के सकारात्मक कार्यों का बखान किया जा रहा है. रेलवे को सर्वाधिक सक्षम, संवेदनशील, सक्रिय विभाग माना जा रहा है. तब मानवीय लापरवाही का दिखाई पड़ना किसी और बात के संकेत देता है. साफ़ सी बात है कि केन्द्रीय स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण कार्य नहीं कर रहा है. निचले स्तर के कर्मचारी भी कार्य करने में कोताही बरतने के साथ-साथ मनमानी करने में लगे हुए हैं. यदि ऐसा न होता तो विगत तीन वर्षों में हुए ट्रेन हादसों में बहुतायत में पटरी का टूटा मिलना बहुत बड़ा कारण रहा है. मुजफ्फरनगर दुर्घटना में तो टूटी पटरी के टुकड़े को बिना बैल्डिंग जोड़ देना घनघोर लापरवाही ही कही जाएगी. 


रेलवे की तरफ से आये दिन किसी न किसी रूप में यात्रियों पर किराये में भार ही डाला जा रहा है और इसके पीछे का उद्देश्य सुगम, सुरक्षित यात्रा का होना बताया जा रहा है. इसके बाद भी ट्रेनों में बादइन्तजामी ज्यों की त्यों है. खाने में गन्दगी, कपड़ों में गन्दगी, ट्रेनों का देरी से चलना, ट्रेनों में आपराधिक घटनाएँ होना आदि ज्यों का त्यों बना हुआ है. वर्तमान मोदी सरकार का रवैया भी वैसा ही है जैसा कि पूर्ववर्ती सरकारों का होता था. ऐसे में बदलाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? कैसे उम्मीद की जा सकती है कि एक दिन इस देश का नागरिक बुलेट ट्रेन में यात्रा करेगा? कैसे कोई यात्री ट्रेन में चढ़ने पर विश्वास के साथ यात्रा करेगा कि वह अपने गंतव्य पर सही-सलामत उतरेगा? किसी अधिकारी-कर्मचारी का निलम्बन अथवा अन्य कोई कार्यवाही दुर्घटनाओं से बचने का अंतिम विकल्प नहीं हैं. अब रेलवे के कर्मियों को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा. स्वयं रेलमंत्री को अपने कर्तव्यों दायित्वों का एहसास करना होगा. उन्हें समझना होगा कि उनके ऊपर लाखों यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेवारी है. उनको भविष्य की कार्ययोजना और आगे की कार्रवाई को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है. आखिर कोई ट्रेन यात्री इतनी अपेक्षा तो कर ही सकता है कि वह उचित किराया देकर ट्रेन में सफ़र कर रहा है तो अपनी मंजिल पर सुरक्षित पहुँच सके. इस तरह की दुर्घटनाओं से मुँह चुराने की नहीं वरन इनसे सबक लेते सीखने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ट्रेन हादसों को रोका जा सके.

+++
उक्त आलेख आज दिनांक 22-08-2017 के डेली न्यूज़ के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

19 August 2017

उस दौर में फोटो देखने का भी अलग मजा था

आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है. ऐसा माना जाता है कि सन 1839 में सबसे पहले में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुईस जेकस तथा मेंडे डाग्युरे ने फोटो तत्व को खोजने का दावा किया था. फोटोग्राफी की आधिकारिक शुरुआत आज से 175 साल पहले, वर्ष 1839 में हुई थी. फ्रांस सरकार ने 19 अगस्त, 1839 को इस आविष्कार को मान्यता दी थी, इसलिए 19 अगस्त को अब विश्व फोटोग्राफी दिवस के रूप में मनाया जाता है. 

फोटो खींचना भी अपने आपमें एक कला है. आज विश्व फोटोग्राफी दिवस पर कतिपय व्यस्तताओं के चलते इस कला का उपयोग नहीं किया जा सका. दरअसल फोटोग्राफी किसी समय में मंहगा शौक तो था ही, बहुत ही उत्सुकता जगाने वाला भी था. रील वाले कैमरे होने के कारण बहुत सहेज कर, गंभीरता के साथ फोटो खींचना होती थी. आज की तरह खटाखट फोटो खींचते रहने की स्थिति थी ही नहीं. रील के अंतिम चरण में तो बहुत सोच-समझ कर फोटो का खींचना होता था. कहीं घूमने जाने की स्थिति में, किसी शादी-विवाह के अवसर पर भी अत्यंत आवश्यक दशा में ही फोटो का खींचना होता था. अकसर ऐसी दशा में कई बार मजाक के तौर पर हम लड़के लोग शरारत में कैमरे का फ्लैश चमकाए लोगों को उल्लू बनाते रहते थे. उस समय जितना शौक फोटो खिंचवाने का रहता था, उससे कहीं ज्यादा उत्सुकता रील साफ़ होने के बाद आने वाली फोटो को देखने की भी रहती थी. लैब से फोटो आने के पहले ही घर के बड़े सदस्य द्वारा एक तरह का फरमान जारी हो जाता था, सबसे पहले उसी को फोटो देखने का. फोटो आने के बाद लोगों की भाव-भंगिमा पर खूब हँसी-ठहाके लगते. लोगों के पोज पर भी खूब मौज ली जाती. 

घर का सबसे पुराना कैमरा. हमने इस पर तो नहीं पर इस जैसे पर भी हाथ आजमाया है 
अब ये सब गायब हो गया है. अब फोटो सैकड़ों की संख्या में निकाली जाती हैं मगर उनको देखने की उत्सुकता न खींचने वाले में होती है और न ही खिंचाने वाले में. अनगिनत फोटो निकालने के बाद भी घरों में एल्बम की कमी पाई जाती है. अब पहले जैसी स्थिति भी नहीं रही एल्बम देखने-दिखाने को लेकर. पहले घर में मेहमान आने पर उसका स्वागत एल्बम से अवश्य ही किया जाता था. अब तो बस डिजिटल क्लिक है जो धीरे-धीरे सेल्फी में आकर सिमट गया है. बचपन से कैमरों के साथ खेलते आने के कारण फोटोग्राफी का भरपूर शौक रहा है. मौका मिलते ही अपने कैमरे के साथ निकल जाते हैं सडकों की, मैदानों की तरफ और बस कैद करते रहते हैं अपने मन के दृश्यों को.

मामा जी द्वारा गिफ्ट किया कैमरा. हम थे शायद कक्षा आठ या नौ में 
आज, 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है. कतिपय कारणों से इतनी व्यस्तता रही कि आज क्लिक्याना नहीं हो पाया. इस दिन वे साथी याद आये जिन्होंने क्लिक करने के शौक को बड़ी गंभीरता से निभाने में अपना पूरा साथ दिया. रील वाला कैमरा हमने बचपन से ही देखा और चलाया. फिर मामा जी की तरफ से कक्षा आठ या नौ में गिफ्ट मिला था क्लिक III कैमरा. सादा फोटो की दुनिया से बाहर निकलने पर रंगीन फोटो वाले कई कैमरे उपयोग किये. 110 वाला कैमरा भी, जिसमें एकदम पतली रील पड़ती थी और याशिका के कई कैमरे. डिजिटल कैमरों का युग चाहे जब शुरू हुआ हो मगर हमने पहला डिजिटल कैमरा लिया था वर्ष 2009 में, मुंबई यात्रा के समय. उसके बाद तीन डिजिटल कैमरे और लिए गए. अंतिम रूप से पिछले वर्ष निकोन का DSLR लिया गया. मोबाइल ने चाहे जितनी तरक्की कर ली हो मगर कैमरे की फोटो का अपना ही आनंद है. इसके बाद भी ये स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि कभी-कभी आकस्मिक रूप से मोबाइल भी फोटोग्राफी में भरपूर साथ दे देता है हमारा.

रील वाला अंतिम कैमरा, जिसे हमने खरीदा 
आज भले ही डिजिटल कैमरों ने, मोबाइल ने फोटोग्राफी को एकदम से आसान बना दिया हो, फोटोग्राफी में भले ही आज सरलता हो गई हो, पहले से ज्यादा आनंद आने लगा हो किन्तु फोटो देखने का असली मजा उसी समय था जबकि रील के द्वारा फोटो का खींचना होता था.

18 August 2017

अभी भी रहस्यमय है महानायक

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. तीन-तीन जाँच आयोगों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा किसी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है. नेता जी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता, देश के प्रति उनकी भक्ति, निष्ठा को देखने-जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेता जी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है.


नेता जी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई गई वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़से पता चला कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नही हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्सके भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजीसे जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि 14 अगस्त से 25 अक्तूबर 1945 के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. बाद में ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर मुखर्जी आयोग के सामने भी यही बातें दुहराते रहे हैं. यदि विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु की खबर को एकबारगी सच मान भी लिया जाए तो उनका अंतिम संस्कार 22 अगस्त को किया जाना संदेह पैदा करता है. नेता जी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि वो शव नेता जी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुराका था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेता जी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे हुए ही कर दिया गया, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि नेता जी उस विमान दुर्घटना में जीवित बच गए थे तो फिर वे गए कहाँ थे? ये तथ्य किसी से भी छिपा नहीं है कि अंग्रेज भले ही भारत देश को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को राष्ट्रद्रोही घोषित करके उनके ऊपर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इसके साथ-साथ नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर नेता जी को ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का अनावश्यक दवाब बनायेंगे. हो सकता है तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो. ऐसे में इन सहयोगियों ने एक योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवा दी हो. इस तथ्य को इस कारण से भी बल मिलता है कि नेता जी समेट वे तीन व्यक्ति (नेताजी के सहयोगी और संरक्षक के रूप में जनरल सिदेयी, विमान चालाक मेजर ताकिजावा और सहायक विमान चालक आयोगी) ही इस दुर्घटना में मृत दर्शाए गए थे जिन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवाई जानी थी.

इसके बाद भी बहुत से लोगों को विश्वास है कि नेता जी देश की आज़ादी के बाद देश में निवास करने लगे थे. ऐसे में पुनः वही सवाल खड़ा होता है कि आज़ाद देश में नेता जी को अज्ञातवास में रहने को किस कारण से मजबूर होना पड़ा? इस सवाल के जवाब के लिए बहुत से लोग गाँधी, नेहरू के साथ नेता जी के वैचारिक मतभेद का जिक्र करते हैं. इसका भी संदेह जताया जाता है कि चूँकि ब्रिटेन नेता जी पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाना चाह रहा था, ऐसे में संभव है कि आज़ादी के समय किसी अप्रत्यक्ष शर्त या समझौते के तहत नेता जी को ब्रिटेन को सौंपे जाने पर सहमति बन गई हो. इसके अतिरिक्त नेता जी की लोकप्रियता, उनकी कार्यक्षमता, बुद्धिमत्ता, राष्ट्रभक्ति को नेहरू-गाँधी और उनके समर्थक भली भांति जानते-समझते थे. ऐसे में वे नहीं चाहते होंगे कि नेता जी वापस आकर देश का नेतृत्व करने लग जाएँ. नेहरू के कार्यकाल में जिस तरह की लालफीताशाही, घोटालों की संस्कृति आज़ादी के तुरंत बाद ही उपजी (इसके लिए 1948 में देश के पहले घोटाले जीप घोटालाको देखा जा सकता है और घोटाला करने वाले ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन, जो नेहरूजी के दाहिने हाथ रहे थे) उसे देखकर इस पर यकीन करना संभव ही नहीं कि नेहरू खुद ही नेता जी बचाए रखना चाहते थे. इस तथ्य को सभी भली-भांति जानते थे कि नेता जी कठोर और अनुशासित प्रशासनिक क्षमता से परिपूर्ण हैं और गाँधी के शब्दों में जन्मजात नेतृत्व करने वाले व्यक्तित्व हैं, ऐसे में नेहरू अपनी सत्ता को गँवाना नहीं चाहते रहे होंगे. नेहरू के अलावा सत्ता का केन्द्रीयकरण कर चुके लोग भी नहीं चाह रहे थे कि नेता जी का सत्य किसी भी रूप में सामने आये या फिर खुद नेता जी ही सामने आयें और सत्ता विकेन्द्रित हो जाये. इस मानसिकता के चलते गठित किये गए शाहनवाज़ आयोग के निष्कर्षों को सांसदों ने, देश की जनता ने ठुकरा दिया और अंततः साढ़े तीन सौ सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद 1970 में इंदिरा गाँधी को जस्टिस जी० डी० खोसला की अध्यक्षता में एक दूसरा आयोग गठित करना पड़ा. इस जाँच आयोग के गठन के सम्बन्ध में भी सरकार की नीयत में खोट ही दिखाई देती है, जिसको ऐसे समझा जा सकता है कि खोसला नेहरूजी के मित्र थे; वे जाँच के दौरान ही इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे समझा जा सकता है कि तत्कालीन सरकार नेता जी की मृत्यु पर उठे संशय के बादलों को दूर करने के लिए कतई संकल्पित नहीं थी. ये तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि जाँच के लिए बना तीसरा मुखर्जी आयोग कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बनाया गया. इसमें सरकार के हस्तक्षेप को नकारते हुए न्यायालय ने स्वयं ही मुखर्जी को आयोग का अध्यक्ष बना दिया तो सरकार ने उनकी जांच में अड़ंगे डालना शुरू कर दिए. इसको ऐसे समझा जा सकता है कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिये गये थे, वे दस्तावेज तक मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये जाते. प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सभी जगह से नौकरशाहों का एक रटारटाया जवाब आयोग को मिलता कि भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का प्रिविलेजउन्हें प्राप्त है.

इसके साथ-साथ भारत सरकार के रवैये के चलते इस प्रकरण की जाँच की सकारात्मकता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाते हैं.

भारत सरकार ने वर्ष 1965 में गठित शाहनवाज आयोगको ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. समूची की समूची जाँच आयोग ने देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया.

1970 में गठित खोसला आयोगको भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया.

मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. अधिकारियों ने वही पुराना राग अलापा कि एविडेंस एक्ट की धारा 123 एवं 124 तथा संविधान की धारा 74(2) के तहत इन फाइलों को नहीं दिखाने का प्रिविलेजउन्हें प्राप्त है.

भारत सरकार ने 1947 से लेकर अब तक ताइवान सरकार से उस दुर्घटना की जाँच कराने का अनुरोध भी नहीं किया है.

आज भी हमारी सरकार के ताइवान के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं कायम हो सके हैं. इसके पार्श्व में नेहरू का, सरकारों का चीन-प्रेम भी हो सकता है, नेता जी का सत्य भी हो सकता है. नेता जी के बारे में उपजे संदेह के बादलों को पहले तो स्वयं नेहरू ने और फिर बाद में केंद्र सरकारों ने छँटने नहीं दिया. पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. अमेरिका-ब्रिटेन-चीन आदि जैसे विकसित और सैन्य-शक्ति से संपन्न देशों के भारी दवाब के चलते भी संभव है जाँच अपनी मंजिल को प्राप्त न कर पाती हो. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता का; नेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दिया; वे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए. ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. भले ही नेता जी अपने अंतिम समय में गुमनामी बाबा बनकर रहे और स्वर्गवासी हुए फिर भी उनकी आत्मा आज भी आज़ादी के लिए भटक रही है, तड़प रही है. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करें.

जय हिन्द!!!

12 August 2017

दोषियों पर तत्काल सख्त कार्यवाही हो

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. ये सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही का मामला है. इस घटना का कारण बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज के इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों के वार्ड में लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित हुई थी. ऐसा बताया गया कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का लाखों रूपया बकाया होने के बाद उसके द्वारा सप्लाई रोकने की बात भी कही जा चुकी थी. ऐसी स्थिति के बाद भी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा उसके बकाया का भुगतान न करना, ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के उपाय न करना आदि दर्शाता है कि वह किस स्तर तक लापरवाह बना हुआ है. इसी मामले में प्रबन्ध तंत्र की तरफ से विशुद्ध लीपापोती होती दिख रही है. उसके द्वारा जानकारी सार्वजनिक की जा रही है कि लिक्विड ऑक्सीजन की किसी भी तरह कमी नहीं थी. कोई भी मौत इसकी कमी से नहीं हुई. ये भी अपने आपमें विशुद्ध गैर-जिम्मेवाराना हरकत है. एक पल को मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में कोई भी मौत लिक्विड ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई पर इससे कैसे इंकार किया जायेगा कि वहाँ तीस बच्चों की मृत्यु हुई है.


इस घटना का संज्ञान बहुत ही संवेदनशीलता से इसलिए भी लिया जाना चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इस घटना के एक दिन पहले मेडिकल के दौरे पर थे. वैसे तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका अपने गृहनगर गोरखपुर में ये सातवाँ दौरा था किन्तु इस बार का दौरा उन्होंने विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही किया था. खुद इंसेफेलाइटिस पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से घंटों मुलाकात करने के बाद उन्होंने इसके इलाज से सम्बंधित सभी पक्षों, सुविधाओं, दवाइयों आदि की जानकारी लेने के लिए एक लम्बी मीटिंग भी की थी. इसके बावजूद इस तरह की घटना बताती है कि अकर्मण्य और गैर-जिम्मेवार अधिकारीयों, प्रशासन पर अपने मुख्यमंत्री का भी असर नहीं है. प्रथम दृष्टया ये मामला भले ही चिकित्सकीय सेवाओं, सुविधाओं में लापरवाही का दिखाई देता हो मगर यदि जरा सी गंभीरता से विचार किया जाये तो आसानी से समझ आ जायेगा कि इसके पीछे कितनी बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है. दरअसल भाजपा द्वारा प्रशासनिक कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने, उसे पारदर्शी बनाने, अधिकारियों को निर्भय होकर काम करने देने की एक प्रणाली विक्सित करने का प्रयास किया गया. इसी क्रम में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से शीर्ष नेतृत्व की तरफ से प्रशासन को, अधिकारियों को स्वतंत्रता से कार्य करने को कहा जा रहा है. भाजपा द्वारा अपने विधायकों, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं को भी रोका गया है कि वे प्रशासनिक अधिकारियों पर किसी तरह का दबाव न बनायें. इस तरह के निर्देशों से प्रशासनिक अधिकारियों में कार्य के प्रति जवाबदेही आणि चाहिए थी वो न आने के बजाय निरंकुशता आ रही है. अभी भी बहुतायत में वे अधिकारी काम कर रहे हैं जो पिछली सरकार के प्रिय बने हुए थे. ऐसे में उनके द्वारा न केवल भाजपा पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं की अवहेलना की जा रही है वरन जनता के हितों को भी अनदेखा किया जा रहा है.


देखा जाये तो गोरखपुर की ये ह्रदयविदारक घटना इसी स्वतंत्रता का दुष्परिणाम है. सोचने वाली बात है कि प्रशासनिक अधिकारी इस कदर स्वतंत्र हो गए हैं कि महज एक दिन पहले मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुपालन करना भी उनको उचित न लगा. यदि ऑक्सीजन की सप्लाई किसी कारण से बाधित होने की आशंका थी तो इसके लिए पहले से समुचित प्रबन्ध क्यों नहीं किये गए थे? वे भी तब जबकि इस बीमारी से भर्ती होने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा था. गोरखपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज प्रबंधन द्वारा जानकारी देने के बाद भी बकाया चुकता करवाने, लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई सुचारू करवाने की तरह क्यों नहीं ध्यान दिया? बच्चों की मृत्यु के बाद जिस तरह की सजगता वहाँ का प्रशासन दिखाने में लगा है यदि उसका शतांश भी पूर्व में दिखा लिया होता तो संभवतः बच्चों को बचा लिया गया होता. अब भले ही चिकित्सालय प्रबंधन अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह की लीपापोती करे; सरकार अपने बचाव के लिए चाहे कुछ कहती रहे मगर कटुसत्य यही है कि बच्चों को वापस नहीं आना है. इस मामले में स्वयं मुख्यमंत्री योगी जी को विशेष रूप से संज्ञान लेते हुए न केवल चिकित्सकीय लापरवाही के बल्कि अन्य दूसरे पक्षों की भी जाँच करवानी चाहिए. जिस तरह से देश-प्रदेश में भाजपा-विरोधी माहौल उसके विरोधियों द्वारा बनाया जा रहा है; जिस तरह से असहिष्णुता जैसे शब्द के द्वारा लोगों में डर-भय का वातावरण बनाया जा रहा है; जिस तरह से शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति भी गैर-जिम्मेवाराना बयान देने लगता है उससे इस घटना के पीछे किसी तरह की साजिश से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. इसलिए स्वयं योगी जी द्वारा सम्पूर्ण घटनाक्रम का गंभीरतापुर्वक संज्ञान लेते हुए सभी गैर-जिम्मेवार लोगों पर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए. अन्यथा की स्थिति में न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर धब्बा लगेगा बल्कि विपक्षियों को इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने का अवसर हाथ लगेगा, जो कम से कम इस समय कदापि उचित नहीं होगा.  

मासूम न्याय चाहते हैं - योगी जी के नाम खुला ख़त

माननीय योगी जी,
सादर प्रणाम,
आपके अपने क्षेत्र गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में दो दिन के भीतर तीस बच्चों की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है. यह उस समय और भी असामान्य हो जाती है जबकि आपका दौरा ऐसी ह्रदयविदारक घटना के ठीक पहले हुआ हो. ये सभी को भली-भांति विदित है कि उस दिन का आपका दौरा विशेष रूप से मेडिकल कॉलेज के लिए ही था. लगभग पूरा ही दिन आपने मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस के मरीज बच्चों के बीच गुजारा था. आपने ICU और CCU में काफी देर तक इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चों और उनके परिजनों से मुलाकात भी की थी. इसके साथ ही आपने इसी सम्बन्ध में एक मीटिंग भी ली थी, जिसमें इस बीमारी से जुड़े चिकित्सकों, विशेषज्ञों आदि से सुरक्षा सम्बन्धी तमाम बिन्दुओं पर संतोषजनक जानकारी ली थी. इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि बच्चों की एक-एक करके मृत्यु होने लगी.

प्रथम दृष्टया इसे ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होना बताया गया वहीं इसके उलट बयान ये भी आया कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से किसी रोगी की मृत्यु नहीं हुई. चलिए एक बारगी मान भी लिया जाये कि मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित नहीं हुई थी पर क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि वहां तीस बच्चों की म्रत्यु नहीं हुई? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि किसी न किसी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही के चलते ये हादसा हुआ? क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि बच्चों की सुरक्षा, उनके इलाज को लेकर किसी न किसी रूप में असंवेदनशीलता का परिचय दिया गया? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों नहीं प्रशासन में सरकार का भय है? क्यों नहीं समाज के किसी भी क्षेत्र में प्रशासनिक सजगता देखने को मिल रही है? क्यों नहीं अपराधियों में, निष्क्रिय लोगों में, कर्तव्यहीन लोगों में, गैर-जिम्मेवार लोगों में सरकारी तंत्र का, उन पर सख्त कार्यवाही होने का डर दिख रहा है? आखिर क्यों? ये सवाल एक हमारे नहीं, बल्कि उन सबके हैं जिन्होंने बड़ी आशा-विश्वास से प्रदेश की अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलना चाहा था. प्रदेश के बहुत बड़े तबके को अभी भी आपके सख्त कदम की अपेक्षा है क्योंकि विगत के तीन-चार माह में उन्हें सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिला है. आज भी सड़क चलते अपराध हो रहे हैं. आज भी हत्याएं, डकैती, हिंसा पूर्व की भांति हो रही हैं. आज भी अराजक तत्त्वों से लोगों में भय बना हुआ है. आज भी प्रशासन पूरी तरह निष्क्रियता दिखा रहा है.

इतना सबकुछ होने के बाद भी प्रदेश के बहुतायत नागरिकों में आपके प्रति विश्वास, आस्था है कि आप यथाशीघ्र कोई ठोस कदम उठाकर प्रदेश को अराजकता से बाहर निकाल लेंगे. इस विश्वास के बीच गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की ये घटना ठेस पहुँचाने का काम करती है. आपकी ईमानदारी, आपकी सत्यनिष्ठा, आपकी कार्यशैली, आपकी जीवनशैली, आपकी साफगोई की तरफ अब लोग निगाह लगाये बैठे हैं कि मासूमों को इंसाफ मिले. मृत्यु के अन्य कारणों की जाँच होती रहेगी किन्तु प्रथम दृष्टया बच्चों की मृत्यु होना सामने आया है. इससे सम्बंधित सभी जिम्मेवार लोगों को तत्काल सजा देने का काम करके आप निराश लोगों में आशा का संचार कर सकते हैं. इसके बाद आप सम्पुर्ण प्रदेश के प्रशासनिक ढाँचे में सख्ती लाने का कार्य करिए. प्रशासन को स्वतंत्रता से कार्य करने देना चाहिए पर इतना भी स्वतंत्र नहीं कर देना चाहिए कि उसमें सरकार के प्रति ही डर-भय न रह जाये.

यदि किसी मुख्यमंत्री के स्थल विशेष के दौरे और बीमारी विशेष से सम्बंधित मीटिंग लेने के बाद भी हीलाहवाली का ये आलम रहे कि तीस बच्चों की मृत्यु हो जाये तो समझा जा सकता है कि प्रशासनिक मशीनरी किस तरह से लापरवाह, अक्षम, असंवेदनशील है. ऐसे गैर-जिम्मेवार लोगों पर यथाशीघ्र सख्त कार्यवाही होनी चाहिए. कार्यवाही, सजा इस तरह की हो कि आने वाले समय में इस तरह की लापरवाही करने की, अपने दायित्व से खिलवाड़ करने की गलती कोई न करे.

आपसे आशा है कि आप इस संवेदनशील, ह्रदयविदारक घटना पर किसी भी तरह की राजनीति नहीं होने देंगे तथा सख्त और सकारात्मक कदम उठाते हुए प्रदेश की जनता को सार्थक सन्देश देने का कार्य करेंगे.


आपका ही.. 

09 August 2017

बुन्देलखण्ड का लोकपर्व - कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.


बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.
महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं. 

07 August 2017

माँग और आपूर्ति के सिद्धांत पर आधारित फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स

किस आसानी से कह दिया जाता है दोस्त और उतनी ही आसानी से कह दिया जाता है कि अब दोस्ती समाप्त। ये वर्तमान का चलन है। इसे हम यदि संस्कृति, सभ्यता के चलन के रूप में न देखकर एक सामाजिक अवधारणा के रूप में स्वीकारें तो शायद ऐसे रिश्तों का आकलन करना आसान हो जायेगा। फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स भले ही इन अंग्रेजी शब्दों के अर्थ सीधे-सीधे उस बात को नहीं साबित कर पा रहे हों जो इनके भीतर छुपा है पर यह तो स्पष्ट ही हो रहा है कि कुछ अनजाना सा अर्थ बड़े ही खूबसूरत शब्दों में छुपाकर सामने रखा गया है। इन शब्दों में छुपी पूरी बहस को लड़का अथवा लड़की के दायरे से बाहर आकर देखना पड़ेगा।


यहाँ तार्किक रूप से अवलोकन करने से पहले इस शब्द-विन्यास पर विचार करें तो और भी बेहतर होगा। पहला शब्द फ्रेंड्स यानि कि दोस्त, अब आइये और देखिये आसपास की दोस्ती की परिभाषा। दो विषमलिंगी आपस में मिलते हैं, कालेज के दिनों में अथवा अपने अन्य कामकाजी दिनों में। आपसी मुलाकातों का दौर बढ़ता है और प्यार जैसा शब्द जन्म लेता है। जन्म तो शायद उसने पहली मुलाकात में ही ले लिया था पर जुबान पर आया कुछ दिनों के बाद। प्यार परवान चढ़ा तो ठीक नहीं तो दोनों दोस्ती तो निभा ही सकते हैं जैसे वाक्य के साथ अपने रिश्तों का पटाक्षेप करते हैं। (पता नहीं रिश्तों का पटाक्षेप होता भी है या नहीं?) अब दोस्ती उस रूप में नहीं होती जो जन्म-जन्मान्तर की बातों पर विचार करे। इस हाथ ले उस हाथ दे वाली बात यहाँ भी लागू होती है। शारीरिक सम्बन्ध अब हौवा नहीं रह गये हैं। दो विपरीत लिंगियों में दोस्ती की कई बार शुरुआत सेक्स के आधार पर ही होती देखी गई है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्यों महानगरों के पार्क, चैराहे शाम ढलते ही जोड़ों की गरमी से रोशन होने लगते हैं? दोस्ती का ये नया संस्करण है।

अब शब्द आता है वेनिफिट्स क्या और कैसा? इसको बताने की आवश्यकता नहीं। महानगरों में चल रहे मेडीकल सेंटर में होते गर्भपात ही बता रहे हैं कि किस वेनिफिट्स की बात की जा रही है। ये बहुत ही साधारण सी बात है कि यदि हमारे रिश्तों की बुनियाद आपसी शर्तों के आधार पर काम कर रही है तो उसमें हम भावनाओं को कैसे सहेज सकते हैं? देखा जाये तो अभी इन शब्दों की संस्कृति का चलन कस्बों, छोटे शहरों आदि में नहीं हुआ है। यदि हुआ भी होगा तो उसका स्वरूप अभी वैसा नहीं है जो इन शब्दों का मूल है। महानगरों में जहाँ तन्हाई है, मकान मिलने की समस्या है, परिवहन की समस्या है, कामकाज के समय निर्धारण की समस्या है, कार्य के स्वरूप में दिन-रात का कोई फर्क नहीं है वहाँ इस तरह के सम्बन्ध बड़ी ही आसानी से बनते देखे जाते हैं। सहजता से कुछ भी कहीं भी मिल जाने की स्थिति ने इस प्रकार के रिश्तों को और भी तवज्जो दी है। किसी के सामने कोई जिम्मेवारी वाला भाव नहीं। माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त यहाँ पूरी तरह से लागू होता है। अब इस तरह का निर्धारण कतई काम नहीं करता कि वो लड़का है या लड़की। दोनों की अपनी जरूरतें हैं, दोनों के अपने तर्क हैं, दोनों की अपनी शर्तें हैं जो पूरा करे वही फ्रेंड अन्यथा कोई दूसरा रिश्ता देखे।

अभी हमें इन रिश्तों की गहराई में जाना होगा और देखना होगा कि हम जिस समाज की कल्पना कर रहे हैं वह किस प्रकार के रिश्तों से बनता है? यह सार्वभौम सत्य है कि आज के युग में परिवारों के टूटने का चलन तेजी से बढ़ा है। लड़के और लड़कियों में कार्य करने की, घर से बाहर रह कर कुछ करने की इच्छा प्रबल हुई है ऐसे में अन्य जरूरतों के साथ-साथ शरीर ने भी अपनी जरूरत के अनुसार रिश्तों को स्वीकारना सीखा है। भारतीय संस्कृति के नाम की दुहाई देकर हम मात्र हल्ला मचाते रहते हैं पर मूल में जाने की कोशिश नहीं करते। बात हाथ से निकलती तब समझ में आती है जब हमारे सामने माननीय न्यायालय आकर खड़े हो जाते हैं, जैसा कि धारा 377 पर हुआ। फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स को युवा वर्ग, वह वर्ग जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है।


04 August 2017

पिता के आशीर्वाद ने बनाया राष्ट्रकवि

आज राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्मदिन है. उनका जन्म 03 अगस्त 1886 को चिरगाँव (झाँसी) उत्तर प्रदेश में हुआ था. उनके पिता का नाम सेठ रामचरण और माता का नाम श्रीमती काशीबाई था. इनके पिता कनकलता उपनाम से कविता करते थे और राम के विष्णुत्व में अटल आस्था रखते थे. गुप्त जी को कवित्व प्रतिभा और रामभक्ति पैतृक मिली थी. वे बाल्यकाल में ही काव्य रचना करने लगे थे. उनके एक छंद को पढ़कर उनके पिता ने आशीर्वाद देते हुए कहा था कि तू आगे चलकर हमसे हज़ार गुनी अच्छी कविता करेगा. बाद में यह आशीर्वाद अक्षरशः सत्य हुआ.

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा चिरगाँव, झाँसी के राजकीय विद्यालय में हुई. इसके पश्चात् उनका प्रवेश झाँसी के मेकडॉनल हाईस्कूल में करवाया गया किन्तु वहाँ इनका मन न लगा. इस कारण दो वर्ष पश्चात् घर पर शिक्षा का प्रबंध किया गया. इन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिन्दी तथा बांग्ला साहित्य का व्यापक अध्ययन किया. वे स्वभाव से लोकसंग्रही कवि थे और अपने युग की समस्याओं के प्रति संवेदनशील भी थे. लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी और मदनमोहन मालवीय उनके आदर्श रहे. बाद में महात्मा गांधी, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू और विनोबा भावे के सम्पर्क में आने के कारण वह सुधारवादी आंदोलनों के समर्थक बने.

मुंशी अजमेरी और महावीर प्रसाद द्विवेदी का इनके लेखन पर गहरा प्रभाव था. मुंशी अजमेरी ने इनकी काव्य-प्रतिभा को निखारा तो महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से आपने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया. 1909 में उनका पहला काव्य जयद्रथ-वध आया. इसकी लोकप्रियता ने उन्हें लेखन और प्रकाशन की प्रेरणा दी. अपने साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से इन्होंने भारत-भारती की रचना की. भारत-भारती के प्रकाशन से ही इनको  अत्यंत प्रसिद्धि मिली. इस कृति के प्रकाशन पश्चात् गांधी ने मैथिली काव्यमान ग्रन्थ भेंट करते

हुए उन्हें राष्ट्रकवि का सम्बोधन दिया. 59 वर्षों में गुप्त जी ने गद्य, पद्य, नाटक, मौलिक तथा अनूदित आदि सहित हिन्दी को 74 रचनाएँ प्रदान की. इनमें दो महाकाव्य, 20 खंडकाव्य, 17 गीतिकाव्य, चार नाटक और गीतिनाट्य हैं. मैथिलीशरण गुप्त जी को 1952 में राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया. सन 1954 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. हिन्दी साहित्य को अनमोल कृतियाँ देने वाले मैथिलीशरण गुप्त जी का का देहावसान 12 दिसंबर 1964 को चिरगांव में ही हुआ. 

31 July 2017

राजनीति का शिकार हुए शिक्षामित्र

उच्चतम न्यायालय के बहुप्रतीक्षित निर्णय में लाखों शिक्षामित्रों का समायोजन निरस्त कर दिया गया है। समायोजन निरस्त किए जाने से शिक्षामित्रों में आक्रोश है और वे उपद्रव रूप में सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं। ये अपने आपमें संवेदित करने वाली बात ही है कि एक निर्णय से लाखों परिवारों के जीवनयापन पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इसी संदर्भ में समझने वाली बात यह भी है कि शिक्षामित्रों द्वारा किया जा रहा उपद्रव इस प्रश्नचिन्ह को दूर नहीं करेगा। नियुक्त किए जा रहे शिक्षकों को जान से मारने की धमकी, विद्यालय न खोलने देने की धमकी, उनकी समस्या पर विचार न करने पर इस्लाम कबूलने की धमकी उनके प्रति संवेदना को समाप्त कर रही है। इसमें दोराय नहीं कि किसी भी व्यक्ति की आजीविका पर संकट आता है तो वह बिना सोचे-विचारे कदम उठाने लगता है। ऐसी स्थिति में शिक्षामित्रों को समझना चाहिए कि उनके समायोजन को राजनैतिक लाभ के लिए किया गया था और इसे किसी सरकार ने नहीं वरन उच्चतम न्यायालय ने निरस्त किया है। ऐसी दशा में उनको विरोध का ऐसा रास्ता अपनाया जाना चाहिए था जो न केवल सरकार को बल्कि न्यायालय को भी उनकी स्थिति पर पुनर्विचार करने को प्रेरित करता।

ग्रामीण और शहरी स्तर की प्राथमिक शिक्षा को सुचारू रूप से संचालित करने की दृष्टि से शिक्षामित्रों का चयन किया गया था। इंटरमीडिएट योग्यता के आधार पर नियुक्त शिक्षामित्रों की संख्याबल को देख राजनैतिक दलों द्वारा उनको वोटबैंक के रूप में देखा जाने लगा। इस क्रम में उनके समायोजन के लिए अपेक्षित योग्यता के मानकों को पूरा करने के प्रयास किए जाने लगे। इसका आरम्भ भी बसपा सरकार द्वारा किया गया। उसकी ओर से दूरस्थ बीटीसी करवाये जाने की अनुमति भी ले ली गई किन्तु योजना के अमल में आने से पूर्व ही प्रदेश में सरकार परिवर्तन की स्थिति आ गई। अब प्रदेश में बसपा की जगह सपा की सरकार बनी जिसने शिक्षामित्र रूपी वोटबैंक को अपने पक्ष में मोड़ने का अवसर न गँवाया। उनकी शैक्षिक एवं अन्य योग्यताओं के आधार पर शिक्षामित्रों को नियमित शिक्षक के रूप में समायोजित किया गया। वोटबैंक के लालच में तत्कालीन सरकार यह गौर करना भूल गई कि शिक्षामित्रों के समायोजन के समय बहुत बड़ी संख्या में टीईटी पास व्यक्ति शिक्षक बनने की आस लगाए बैठे थे। सरकार के इस निर्णय को इन्हीं टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों द्वारा अदालत में चुनौती दी गई। तमाम सारे पहलुओं और बिन्दुओं पर विचार करने के बाद पहले उच्च न्यायालय ने और बाद में उच्चतम न्यायालय ने शिक्षामित्रों के समायोजन को गलत ठहराते हुए उसे निरस्त कर दिया।

यकीनन इस समायोजन में यदि कमियाँ थी तो उनमें शिक्षामित्रों का कोई दोष नहीं था। उनके द्वारा समायोजन के लिए तत्कालीन सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों का ही पालन किया गया। इसमें भी जो शिक्षामित्र उस योग्यता को पूरा नहीं कर पा रहे थे वे समायोजन से बाहर ही रहे थे। यहाँ एक बात गौर करने योग्य है कि आखिर सरकार के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को नियुक्त करने की बजाय शिक्षामित्रों को समायोजित करने में लग गई? यदि सरकार का मन वाकई समायोजन करने का ही था तो क्यों नहीं मानकों के अनुरूप कदम उठाए गए? वोटबैंक की राजनीति के चलते राजनैतिक दलों, सरकारों ने हमेशा स्वार्थपरक कदम उठाए हैं। उनके द्वारा क्षणिक लाभ को देखा जाता है और दूरगामी लाभों को, नुकसान को नजरअंदाज कर दिया जाता है। तत्कालीन सपा सरकार की इसी अगम्भीरता ने लाखों परिवारों के सामने रोजीरोटी का संकट पैदा कर दिया है। अब जबकि शिक्षामित्रों के हाथ से सारी स्थिति निकल चुकी है तब उनके सामने सिर्फ सहानुभूति का, संवेदना का ही रास्ता बचता है। शांतिपूर्वक अपने विरोध को दर्शाते हुए वे उच्चतम न्यायालय से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील करें। उपद्रव, हिंसा, धमकी आदि उनके मामले को कमजोर बनाने के अलावा कुछ और न करेगा। इनके संगठनों और नेताओं को इस पर आक्रोशित हो राजनीति करने के बजाय शांतिपूर्ण ढंग से समाधान का रास्ता खोजने, बनाने का प्रयास करना होगा।

19 July 2017

हिन्दू-विरोध से हाशिये पर आते राजनैतिक दल-व्यक्ति

भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में हिन्दुओं को लेकर एक अजीब सा वातावरण लगातार बना रहा है. आज़ादी की लड़ाई में भले ही हिन्दू-मुस्लिम एकता के गीत गाये जाते रहे हों किन्तु आज़ाद भारत में तो कोशिश यही की जाती रही है कि हिन्दू-मुस्लिम विभेद पनपता रहे. इस विवाद को और बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर हिन्दुओं को ज़लील करने का, उनको मानसिक प्रताड़ित करने का, उन पर शारीरिक अत्याचार करने का काम भी होता रहा है. ऐसे माहौल को विगत तीन वर्षों से और भी हवा दी जाने लगी है. इसके पीछे केंद्र की राजनीति में भाजपा का आ जाना रहा है. भाजपा के आने से भी ज्यादा बड़ी घटना ऐसे लोगों के लिए नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने की रही. हिन्दू धर्म के विरोधी राजनैतिक लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि केंद्र की सत्ता भाजपा इतने विशाल बहुमत से प्राप्त कर लेगी. राजनैतिक उच्चावचन के क्रम में सभी को इसका आभास बना हुआ था कि देश की शीर्ष सत्ता में कांग्रेस गठबंधन और भाजपा गठबंधन ही क्रमिक रूप से आते-जाते रहेंगे मगर किसी भी राजनैतिक विश्लेषक अथवा प्रतिनिधि ने इसका विचार कभी नहीं किया था कि भाजपा ऐसे प्रचंड बहुमत से आएगी. इसके आगे किसी ने ये भी विचार नहीं किया था कि कांग्रेस को आँकड़ों के खेल में विपक्ष के नेता पद का मिलना भी दूभर हो जायेगा. कोढ़ में खाज वाली स्थिति उस समय पैदा हो गई जबकि ऐसे प्रचंड बहुमत के चलते पूर्व घोषित नरेन्द्र मोदी ही प्रधानमंत्री बने. ये स्थिति उन लोगों के लिए अत्यंत कष्टकारी थी जो नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा के साथ ही अगले को हत्यारा, खूनी दलाल  कार्यालय में चाय बेचने के लिए नियुक्ति आदि जैसी दो कौड़ी की बात करने लगे थे.


इसके बाद भी इन राजनैतिक कुंठित लोगों की मनोवृत्ति पर कोई अंतर नहीं देखने को मिला. हिन्दुओं के प्रति नफरत का भाव और तीव्रता पकड़ने लगा. देश के अनेक इलाकों में संगठित रूप से हिन्दुओं पर, संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले किये जाने लगे. मुस्लिम तुष्टिकरण और तेजी से किया जाने लगा. इसके पीछे उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव था. प्रदेश की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों को लग रहा था कि वे अपने-अपने वोट-बैंक की मदद से प्रदेश की सत्ता को प्राप्त कर लेंगी. एक काम बोलता है और मुसलमानों के सहारे सत्ता पाने की चाहत सजाये बैठी थी तो दूसरे दल का हिसाब उसके दलित वोटों पर निर्भर था. प्रदेश के चुनाव ने दोनों के दिमाग को कई-कई वाट का झटका दिया. मतदाताओं ने अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग करते हुए इन दोनों दलों के तुष्टिकरण हथियार को मोथरा कर दिया. मतदाताओं के इस संगठित स्वरूप के पीछे भी इन्हीं राजनैतिक लोगों की हिन्दू विरोधी मानसकिता प्रमुख रही. जाति-वर्ग और मजहब के तुष्टिकरण को साथ लेकर बढ़ते ऐसे दलों ने सोचा भी नहीं होगा कि हिन्दू-विरोधी मानसिकता दर्शाने के कारण इन लोगों का ऐसा हाल होगा कि सीटों का आंकड़ा पचास की संख्या भी न छू सकेगा. जिस दल ने अपने दलित वोट-बैंक के चलते राजनीति में टिकट व्यापार आरम्भ किया उसको तो बीस की संख्या पाने के लाले लग गए. पाँच साल का काम बोलता है दिखाने की जल्दबाजी में ट्रेन भी दौड़ाई गई, हाईवे को भी दिखाया गया, हाईवे पर लड़ाकू विमान भी उतारे गए मगर संगठित हिन्दू मानसिकता ने सबको जमीन पर उतार कर रख दिया.

केंद्र की जबरदस्त पराजय और हिन्दू मानसिकता की विजय को अभी लोग पचा भी नहीं पाए थे कि उत्तर प्रदेश की प्रचंड विजय ने सबके दिमाग में असंतुलन पैदा कर दिया. कोई ईवीएम को दोष देने लगा कोई बड़े स्तर पर देश-प्रदेश में उपद्रव होने की बात करने लगा, किसी को असहिष्णुता दिखाई देने लगी तो किसी की बीवी को यहाँ रहते हुए डर लगने लगा. हिन्दू-विरोधी मानसकिता वालों पर अभी एक चोट और लगनी बाकी थी. प्रदेश की ऐतिहासिक विजय के बीच मुख्यमंत्री के लिए मंथन चलने लगा और कई दिन के समुद्र-मंथन के बाद जो नाम उभर कर सामने आया उसने हिंदुत्व गरिमा को और प्रकाशवान किया. योगी आदित्यनाथ का नाम सामने आते ही हिन्दू-विरोधी मानसिकता वालों को धरती घूमती नजर आने लगी. वे सब हिन्दू धर्म के लिए अनाप-शनाप बकने लगे. इन लोगों को समझ आ गया कि मुस्लिम तुष्टिकरण अब जीत का आधार नहीं है; दलित वोट-बैंक के सहारे सत्ता हथियाई नहीं जा सकती है; यादवों अकेले के दम पर काम नहीं बोलता है. दलितों, पिछड़ों की राजनीति के सहारे अपनी-पानी जेबें भरने वाले इन दलों को अपने आसपास बहुत बड़ा शून्य दिखाई देने लगा.


इस शून्य का ब्लैक होल में बदलना अभी जारी था. केंद्र और सबसे बड़े प्रदेश के बाद देश के प्रथम नागरिक का निर्वाचन शेष था. भाजपा के थिंक टैंक ने दलित कार्ड के साथ-साथ संघ की पसंद का सम्मान करते हुए जिस व्यक्ति को राष्ट्रपति निर्वाचन के लिए चुना उसने दलित राजनीति करने वाले तमाम दलों की रीढ़ तोड़कर रख दी. एक झटके में ऐसे सभी दलों को आईना दिखा दिया गया कि दलित की राजनीति करने वाले कैसे दौलत की राजनीति करने लगे हैं. लगातार हाथ से निकलती बाजी देखकर बौखलाहट इतनी तेज हो गई कि कोई इस्तीफ़ा देकर भाग निकला तो कोई भगवानों को शराब के ब्रांड से जोड़ने लगा. असल में ये सिर्फ अपनी खीझ नहीं वरन भाजपा की रणनीति की काट न खोज पाने की झुंझलाहट है. देखा जाये तो न सिर्फ भाजपा के प्रति खीझ वरन हिन्दुओं के प्रति भी आक्रोश है. इसी आक्रोश के चलते वे गाली देने की स्थिति में हैं. ये और बात है कि सदन की गरिमा का ख्याल रखते हुए वे भाजपा को, मोदी को, हिन्दुओं को माँ-बहिन की गलियां नहीं दे पा रहे हैं तो अपनी खिसियाहट को किसी और रूप में निकालने में लगे हैं. एक तरह से उनकी ये खिसियाहट हिन्दू समाज के लिए जागरण का काम कर रही है. कम से कम इन्हीं बातों का जवाब देने के लिए हिन्दू समाज अब जागृत हो रहा है.