21 May 2018

ओरछा बुन्देलखण्ड में भारतीय फिल्म समारोह


बुन्देलखण्ड सदैव से अनेकानेक रत्नों से सुशोभित रहा है. शौर्य, सम्मान, कला, संस्कृति, साहित्य, सामाजिकता आदि में यहाँ विलक्षणता देखने को मिलती आई है. यहाँ के निवासी अपने-अपने स्तर पर बुन्देलखण्ड की संस्कृति को उत्कर्ष पर ले जाने का कार्य करते रहते हैं. इसी कड़ी में बुन्देलखण्ड निवासी फिल्म अभिनेता राजा बुन्देला द्वारा ओरछा में इस वर्ष, 2018 में भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया. पाँच दिवसीय यह आयोजन 18 मई से लेकर 22 मई तक होना है. राजा बुन्देला फिल्मों की दृष्टि से जाना-पहचाना नाम है और उनकी एक विशेषता यह भी है कि मुम्बई में रहने के बाद भी वे बराबर, नियमित रूप से बुन्देलखण्ड से सम्पर्क बनाये हुए हैं. बुन्देलखण्ड राज्य की माँग में भी उनकी आवाज़ सुनाई देती है. फ़िलहाल, उनके बारे में फिर कभी, अभी उनके इस भागीरथ प्रयास के बारे में कुछ चर्चा कर ली जाये.

रुद्राणी कलाग्राम, ओरछा का विहंगम दृश्य 


बुन्देलखण्ड की उस पावन धरा में, जहाँ श्रीराम राजा रूप में विराजमान हैं, भारतीय फिल्म समारोह का आयोजन अपने आपमें सुखद एहसास जगाता है. ओरछा में राजा बुन्देला द्वारा स्थापित, संस्कारित ‘रुद्राणी कलाग्राम’ में पाँच दिवसीय फिल्म समारोह का आयोजन निश्चित ही बुन्देलखण्ड की उन प्रतिभाओं को एक मंच देगा, जो स्व-प्रोत्साहन, स्व-संसाधनों से फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. ऐसे ही सक्रिय लोगों में शामिल झाँसी के संजय तिवारी ने बुन्देलखण्ड फिल्म एसोसिएशन के बैनर तले वर्ष 2016 में बुन्देलखण्ड फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया था. उस आयोजन में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में निर्मित लघु-फिल्मों को देखकर फिल्म समीक्षकों को आभास हुआ कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में फिल्म निर्माण में अपार संभावनाएं हैं. ऐसे में राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी (जो फ़िल्मी दुनिया का जाना-पहचाना नाम है) का प्रयास बॉलीवुड तक बुन्देलखण्ड की फिल्म प्रतिभा की गूँज को ले जायेगा.


ओरछा में बेतवा नदी के किनारे लम्बे-चौड़े प्राकृतिक क्षेत्र में फैले रुद्राणी कलाग्राम में भारतीय फिल्म समारोह के लिए दो टपरा टॉकीज बनाई गईं हैं. टपरा टॉकीज एक तरह की अस्थायी व्यवस्था होती है जो बाहर से महज एक विशालकाय तम्बू जैसी प्रतीत होती है मगह अन्दर से पूरी तरह से किसी हॉल का एहसास कराती है. एक टपरा टॉकीज में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बनी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है और दूसरी में हिन्दी फीचर फ़िल्में दिखाई जा रही हैं. इसके साथ-साथ सांध्यकालीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में, हरे-भरे घने वृक्षों के आँचल में मुक्ताकाशी मंच का निर्माण किया गया है. रुद्राणी कलाग्राम में दिन का आरम्भ योग के साथ होता है और फिर अलग-अलग निर्धारित स्थानों पर, निर्धारित समय पर अलग-अलग कार्यक्रम संचालित होने लगते हैं. टपरा टॉकीज में फिल्मों का प्रदर्शन होता है. कार्यशाला स्थल पर बाहर से आये विषय-विशेषज्ञ फिल्मों से सम्बंधित तकनीकी जानकारी प्रशिक्षुओं को प्रदान करते हैं. कलाग्राम के दूसरी ओर बने स्थल पर फिल्म से सम्बंधित विषय पर आख्यान की भी व्यवस्था है. जहाँ फ़िल्मी दुनिया के रोहिणी हट्टंगड़ी, रजत कपूर, केतन आनंद, नफीसा अली जैसे नामचीन कलाकार सबसे रू-ब-रू होते हैं.

नाटक तीसरा कम्बल 

दिन भर की गतिविधियों का सञ्चालन नियंत्रित रूप में हो रहा है. सबकुछ यथावत चलता देखकर अच्छा लगा. एक अकेले व्यक्ति राजा बुन्देला के प्रयास और उनके छोटी सी टीम के समर्पण से यह समारोह सुखद अनुभूति दे रहा है. यद्यपि इस पहले प्रयास में कुछ कमियां भी देखने को मिलीं तथापि वे इस कारण नकारने योग्य हैं क्योंकि एक तो यह पहला प्रयास है, दूसरे बिना किसी तरह की आर्थिक मदद के इतना बड़ा आयोजन करवाना अपने आपमें जीवट का काम है. राजा बुन्देला और उनकी पत्नी सुष्मिता मुखर्जी इन कमियों को देख-महसूस कर रहे हैं और अगले आयोजन में इनको सुधारने की इच्छाशक्ति भी व्यक्त करते हैं. यही संकल्पशक्ति ही ऐसे समारोहों का भविष्य तय करती है. राष्ट्रीय स्तर के ओरछा में आयोजित इस पहले फिल्म समारोह में निश्चित ही कमियाँ दिखेंगी किन्तु जिस स्तर का समारोह हो रहा है, जिस तरह का उद्देश्य लेकर समारोह संचालित है, जिस तरह का मंच कलाकारों को प्रदान किया जा रहा है उससे आने वाले समय में निश्चित ही बुन्देलखण्ड को, यहाँ के कलाकारों को फिल्म क्षेत्र में उत्कृष्ट पहचान मिलेगी. 



19 May 2018

दुर्घटनाओं से नहीं सीखेंगे

बनारस में निर्माणाधीन फ्लाईओवर की बीम गिरने से हुए हादसे को महज इसलिए संवेदनशील नहीं माना जा सकता कि वह देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र का हादसा है. इस हादसे को इसलिए भी संवेदनशील माना जाना चाहिए क्योंकि इस हादसे का शिकार लोग वे मासूम नागरिक हैं जिनका कोई दोष नहीं. वे सभी के सभी सेतु निगम के अधिकारियों सहित समस्त कार्यशील लोगों की लापरवाही का शिकार हो गए. बीम के रखे जाने के समय अथवा उसके बाद सम्बंधित क्षेत्र में यातायात को न रोकने, उसका डायवर्जन न करने को हादसे का जिम्मेवार बता रहे हैं वे कहीं न कहीं हादसे की गंभीरता को कम कर रहे हैं. ये समझने वाली बात होती है कि जब इस तरह के बड़े निर्माण हो रहे होते हैं और उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कोई बड़ी संस्था के द्वारा संपन्न किया जा रहा होता है तो आम नागरिकों का एक विश्वास बना होता है. तमाम तरह की विसंगतियों के बाद जैसे आम नागरिक लोकतंत्र पर भरोसा करता है, अपने-अपने प्रदेश, देश की सरकार पर विश्वास करता है, उसके कदमों-नीतियों की आलोचना करने के बाद भी उनके प्रति विश्वास व्यक्त करता है ठीक उसी तरह की स्थिति यहाँ बनी होती है. फ्लाईओवर जैसे निर्माण आनन-फानन में नहीं किये जाते. ऐसे विस्तारपूर्ण निर्माण के लिए सम्पूर्ण मशीनरी एकजुटता से कार्य करती है. इसके बाद भी यदि किसी तरह की चूक होती है तो माना जा सकता है कि सम्बंधित तंत्र अपनी जिम्मेवारी को समझ नहीं रहा था.


अब जबकि सेतु निगम के वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है. उनसे और बाकी सम्बंधित पक्षों से पूछताछ की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इस तरह की कार्यवाही से आगे के लिए कोई सबक मिलेगा, ऐसा लगता नहीं है. निगम के कुछ उच्चधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करा दिया गया है, इससे होगा क्या? अदालती प्रक्रिया में तारीखों पर तारीखें पड़ती रहेंगी. हादसे का शिकार परिवार मुआवजे के कुछ लाख रुपये लेकर अपने आँसुओं को रो-रोकर सुखा लेंगे. कई-कई साल बाद संभव है कि कुछ अधिकारियों को सजा, जुरमाना जैसा कुछ हो जाये, ये भी संभव है कि वे छूट भी जाएँ. छूटने की सम्भावना इसलिए भी प्रबल दिखाई दे रही है क्योंकि पूछताछ के दौरान एक तथ्य यह भी निकल कर आया कि बीम रखने सहित अन्य निर्माण सम्बन्धी कार्यों के लिए यातायात रोकने पर निगम के कर्मियों पर प्रशासन द्वारा प्राथमिकी दर्ज करवा दी गई थी. इससे भी साफ़ है कि देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में सार्वजनिक संस्थाओं के बीच आपस में ही समन्वय नहीं है.

यदि प्राथमिकी दर्ज करवाए जाने की बात सत्य है तो यह भविष्य के लिए भी बुरा संकेत है. देश लगातार विकास की प्रक्रिया से गुजरता रहता है. इस चरण में बड़े-बड़े निर्माण समाज में आम नागरिकों के बीच ही संपन्न होते हैं. दैनिक जीवन-चर्या के बीच ऐसे निर्माणों में जोखिम भी बहुत ज्यादा रहते हैं. इन जोखिमों का शिकार कई बार कर्मचारी भी होते हैं और कई बार नागरिक भी इसका शिकार हो जाते हैं. ऐसे किसी भी मामले में सम्बंधित तंत्र को चाहिए कि उससे जुड़े जितने भी विभाग हैं, संस्थाएं हैं सभी में आपस में समन्वय स्थापित कर लिया जाये. इससे भविष्य में भले ही दुर्घटनाओं को, जोखिमों को रोका न जा सके किन्तु कम तो किया ही जा सकता है. इस दुर्घटना से संस्थाएं, शासन, प्रशासन, नागरिक क्या सबक लेंगे कहा नहीं जा सकता है क्योंकि ये कोई पहली या आखिरी दुर्घटना नहीं है. आये दिन मानव-रहित रेलवे क्रासिंग की दुर्घटनाओं को हम देखते-पढ़ते हैं. आये दिन निर्माणाधीन इमारतों का गिरना सुनाई देता है, अक्सर किसी न किसी सार्वजनिक, निजी संपत्ति के कारण दुर्घटनाएं होती रहती हैं. देखने में आया है कि इन दुर्घटनाओं से कोई सीखने को तत्पर नहीं दिखता है. दुर्घटनाओं के होने के बाद भी न केवल मानव-रहित रेलवे क्रासिंग नागरिकों द्वारा पार की जाती है वरन जहाँ क्रासिंग है वहां भी दो-पहिया वाहनों वाले, पैदान नागरिक उसे पार करते देखे जाते हैं. सेल्फी मोड के चलते भी नौजवान अक्सर दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं.

ये सवाल सबसे अहम है कि हम कब सीखेंगे? क्या हम हादसों को देख-सुनकर उन्हें विस्मृत करने का काम ही करते रहेंगे? दुर्घटनाओं के बाद सरकार, शासन, प्रशासन को कोसने का काम करते रहेंगे? मुआवजे के चंद रुपये किसी व्यक्ति की भरपाई नहीं कर सकते. ये बात सरकार को, हम नागरिकों को समझनी ही होगी. न केवल समझना होगा बल्कि प्रण करना होगा कि अब ऐसी लापरवाहियाँ और नहीं, वे चाहें सम्बंधित तंत्र की तरफ से हों या फिर नागरिकों की तरफ से. आखिर एक-एक जान की कीमत उसके परिवार को, देश को चुकानी होती है.

17 May 2018

कर्नाटक में भाजपा की अग्नि-परीक्षा


अंततः कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में येदियुरप्पा ने शपथ ग्रहण कर ली है. उनके शपथ लेने के बाद भी ये अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या वे सदन में बहुमत सिद्ध कर सकेंगे? चुनाव परिणामों के बाद की अंतिम स्थिति में भाजपा के पास बहुमत के आँकड़े से कम सीटें रहीं. भाजपा जहाँ खुद को सबसे बड़े दल के रूप में देखने के बाद पहले सरकार बनाने के रूप में स्वीकारोक्ति चाह रही थी वहीं दोनों विपक्षी दलों ने अपनी संयुक्त सीटों की संख्या के आधार पर सरकार पहले बनाने का दावा पेश किया. ऐसी विषम स्थिति में गेंद राज्यपाल के पाले में आ गई थी. तमाम ऊहापोह के बाद कर्नाटक के राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. कांग्रेस जैसे पहले से ही तैयार बैठी थी, राज्यपाल का फैसला भाजपा के पक्ष में आते ही उसने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. देर रात तक चली तीन सदस्यीय पीठ ने येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार करते हुए शपथ ग्रहण का रास्ता खोल दिया.


बड़े दल के रूप में उभर कर आने के कारण राज्यपाल द्वारा भाजपा को पहले सरकार बनाने का आमंत्रण देना क्या वाकई संवैधानिक त्रुटि है? क्या वाकई ये लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या है? क्या वास्तव में राज्यपाल के इस कदम को नैतिकता की हार कहा जायेगा? ऐसे और भी प्रश्न हैं जो अब भारतीय राजनैतिक पटल पर उभरने लगे हैं. यहाँ संविधान विशेषज्ञों की अपनी-अपनी राय है और लगभग सभी की राय में किसी भी राज्य में राज्यपाल द्वारा सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का आमंत्रण देना गलत नहीं है. ऐसा उस स्थिति में गलत कहा जा सकता है जबकि चुनाव पूर्व गठबंधन वाले दलों की संयुक्त सीटों की अधिक संख्या होने के बाद भी उन्हें सरकार बनाने के लिए न्यौता नहीं दिया जाता है. येदियुरप्पा को आमंत्रित करने के साथ ही चिर-परिचित भाजपा-विरोधी माहौल बनता दिखाई देने लगा.

इस विरोध के बीच कई घटनाओं, स्थितियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुत से विश्लेषकों ने लगभग साबित कर दिया था कि वहां भाजपा को लाभ मिलने वाला नहीं है. असल में 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. कोशिश ये रही कि कैसे न कैसे करके इन स्थितियों को कर्नाटक चुनाव से जोड़ते हुए ये साबित किया जाये कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.

ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इस तरह के विश्लेषणों के बाद कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस इसके लिए आश्वस्त हो गई थी कि कर्नाटक में वहां के मतदाता उसे ही चुनेंगे. कांग्रेस राज्य में अपनी पुनर्वापसी को लेकर पूर्णतः आश्वस्त हो गई थी. कर्नाटक में इन विश्लेषणों के उलट असलियत ये रही कि राज्य में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का मोह कांग्रेस से भंग हो गया था. मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही बहुमत का जादुई आँकड़ा न छू सकी हो किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है.

राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को आमंत्रित किया. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली. इसके बाद भी सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर 104 की संख्या को बढ़ाकर कैसे बहुमत के जादुई अंक तक ले जाया जायेगा? फ़िलहाल तो अभी सदन में बहुमत सिद्ध करने का कार्य बाकी है और जेडीएस की तरफ से भाजपा पर प्रति विधायक सौ करोड़ रुपये की पेशकश का आरोप भी लगाया जा चुका है. संवैधानिक विशेषज्ञों की राय के अनुसार कर्नाटक के राज्यपाल ने भले ही सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को बुलाकर संवैधानिक कदम ही उठाया है किन्तु कहीं न कहीं बहुमत के आँकड़े को छूने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का अवसर भी तो उपलब्ध करवाया है. ये कहकर कि पूर्व में कांग्रेस की ओर से भी इसी तरह की स्थितियाँ उत्पन्न करके सरकारें बनाई जाती रही हैं, विपक्षियों को रोका जाता रहा है कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है. सदन में भाजपा, येदियुरप्पा क्या सिद्ध करते हैं, ये समय के गर्भ में है पर कुल मिलाकर उनकी अग्नि-परीक्षा शुरू हो चुकी है.  

15 May 2018

सियासी दाँव-पेंचों में उलझा कर्नाटक


कर्नाटक राज्य विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के पहले से ही बहुतेरे मीडिया केन्द्रों ने लगभग साबित सा कर दिया था कि वहां भाजपा को कोई लाभ होने वाला नहीं है. इस तरह के आकलन करने के पीछे उनके पास कोई ठोस नजरिया नहीं था और न ही कोई ठोस तथ्य मौजूद थे. कर्नाटक चुनाव का आकलन चुनाव विश्लेषकों द्वारा, मोदी-विरोधियों द्वारा, भाजपा-विरोधियों द्वारा उत्तर प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुए गोरखपुर एवं फूलपुर लोकसभा उपचुनावों को आधार बनाकर किया जा रहा था. इन दोनों चुनावों में भाजपा हार गई थी और इनमें सपा-बसपा का गठबंधन विजयी रहा था. ऐसे में सभी ने ये स्वीकार सा कर लिया था कि यदि सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हो जाये तो भाजपा को हराया जा सकता है. इसके साथ-साथ 2014 से लेकर अभी तक प्रत्येक छोटे-बड़े चुनाव में राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा, चुनाव सर्वेक्षणों द्वारा मोदी छवि को ही आधार बनाया गया है. इस आधार को ऐसे लोग इस बार दरकता हुआ बताने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे थे. उनके इस तरह के विश्लेषण के पीछे पेट्रोल, डीजल की कीमतों की वृद्धि को, रुपये की कीमत में आती गिरावट को आधार बनाया जा रहा था. इसके अलावा जिस तरह से केंद्र सरकार ने नोटबंदी के तुरंत बाद जीएसटी को लागू किया, उससे ऐसा लगने लगा था कि देश का व्यापारी अवश्य ही केंद्र सरकार के खिलाफ विद्रोह करेगा. इन दो जगहों पर केंद्र सरकार को असफल दिखाने वाले विश्लेषकों ने रोजगार देने के मामले में भी केंद्र सरकार को पिछड़े पायदान पर दिखाया था. मोदी-विरोधियों द्वारा केंद्र सरकार की किसी भी योजना की, किसी भी कदम की सराहना करते नहीं दिखाया गया. देश भर में चलने वाले तथाकथित विरोध को कैसे न कैसे करके कर्नाटक चुनाव से जोड़ने की कोशिश करते हुए ये साबित किया जा रहा था कि वहां भाजपा की पराजय सुनिश्चित है.


आर्थिक स्तर पर ऐसी स्थितियों को बार-बार दिखाने वाले मोदी-विरोधियों द्वारा सफलता न मिलते देख कर कठुआ काण्ड की इबारत लिखी गई, जिन्ना तस्वीर का प्रकरण उठाया गया. इस तरह के मामले किसी न किसी तरह से भाजपा-विरोध में, मोदी-विरोध में उठाकर जनता के बीच लाया जा रहा था. इन सबके केंद्र में मुख्य रूप से कर्नाटक चुनाव ही बना हुआ था. ऐसे विश्लेषक जिनका विश्लेषण सिर्फ और सिर्फ पूर्वाग्रह पर आधारित रहता है वे किसी न किसी तरह भाजपा को कर्नाटक में हराते दिख रहे थे. इसके उलट असलियत ये है कि कर्नाटक में विगत पांच वर्ष के शासन में ऐसी तमाम विसंगतियाँ उभर कर सामने आईं जिनसे जनता का रुख भाजपा की तरफ हुआ. किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं हों, वहाँ पर भ्रष्टाचार होने का मुद्दा हो, राज्य का अलग झन्डा बनाये जाने का विचार हो, पेयजल की समस्या का होना हो या फिर चुनाव के ठीक पहले लिंगायत मुद्दे को हवा देना का मामला हो, सभी ने कांग्रेस को कई पायदान पीछे कर दिया था.

चुनाव रैलियों के दौरान जिस तरह से दोनों तरफ से बयानों के तीर छोड़े गए, उसमें अपनी उपलब्धियाँ कम बल्कि दूसरे की नाकामियां अधिक बताई गईं. मोदी के पक्ष में कहीं न कहीं केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजनायें, स्वच्छ भारत अभियान, अटल पेंशन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, स्टार्ट अप योजना, फसल बीमा योजना आदि भी काम करती दिख रही थीं. हाल ही में देश भर में विद्युतीकरण ने भी आम नागरिकों के मन में केंद्र सरकार की विकास नीति को गहरे से बैठा दिया था. इन योजनाओं के सहारे और मोदी छवि के सहारे भाजपा कर्नाटक में भले ही सरकार न बना सके किन्तु अपने पिछले प्रदर्शन से कहीं अधिक अच्छा प्रदर्शन कर सकेगी. इसके अलावा कांग्रेस प्रचारकों के पास वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री की सफलता गिनाने को भी नहीं थीं. ये स्पष्ट संकेत कर रहा था कि इन चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में अपनी सफलता की कहानी को दोहरा नहीं सकेगी. अपनी-अपनी योजनाओं की सफलता-असफलता के रथ पर चढ़कर चुनाव प्रचार में निकले मोदी के प्रति युवाओं के मन में अधिक आकर्षण, अधिक सम्मान देखने को मिल रहा था. कर्नाटक का आम मतदाता कर्नाटक की सरकारों के कार्यों का आपस में तुलनात्मक अध्ययन नहीं कर रहा था वरन उसके सामने वर्तमान कांग्रेस सरकार के पांच वर्षों के मुकाबले भाजपा के केंद्र में चार सालों का कार्य था. स्पष्ट है कि वे कार्य राज्य के कार्य पर भारी पड़े.

चुनाव परिणामों का आना अभी भी बना हुआ है. देर रात तक स्थिति स्पष्ट होगी कि कौन सरकार बनाएगा किन्तु चुनाव परिणामों से इतना स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा कर्नाटक में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर आ रही है. बाकी सरकार बनाना इसी आँकड़ेबाजी के अधीन है. इसमें जो भी जादुई 113 का आँकड़ा छू लेगा वही जनता का प्रतिनिधित्व करने आगे आ जायेगा.  

13 May 2018

मदर्स डे की सेल्फ़ी

मदर्स डे की सेल्फ़ी - लघुकथा 
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“मम्मी, तुमसे दो सेकेंड आँखे खुली नहीं रखी जा सकती..?” मोबाइल में फ़ोटो देखते बेटे की आवाज़ में तेज़ी आई.

“ओफ़्फ़ो, क्या मम्मी तुम भी, अब आँखें खोली तो नीचे देखने लगी. ये-ये-ये दिख रहा, गोल-गोल, काला निशान... इसे देखो, इसे...” ऊँगली से मोबाइल में कैमरे के लेंस को दिखाते हुए बेटे की आवाज़ में झल्लाहट, खीझ, ग़ुस्सा स्पष्ट दिखाई दे रहा था. 

“अबकी आँखें खोले रखना देवी माँ और इसी काले गोले को देखती रहना, बस...” हाथ जोड़ते हुए बेटे ने माँ को कड़े शब्दों में समझाया. 

“वो बेटा... क्या है न... वो... इसकी सफ़ेद चमक में आँखें चौंधिया जाती हैं.... अपने आप... बंद हो जाती हैं.” माँ ने हकलाते हुए, बहुत धीमे से आवाज़ निकाली. 

“ठीक है, ठीक है...” बेटा अपने मोबाइल का एंगल सेट करते हुए बोला. 

“जे बात, अब एकदम चौकस फ़ोटो आई है.” चेहरे पर ख़ुशी और होंठों पर मुस्कान बिखेर बेटे ने माँ की तरफ़ देखे बिना कहा और मोबाइल में कुछ खिट्ट-पिट्ट करने लगा. 

“बेटा वो....” इससे पहले कि माँ कुछ पाती बेटे ने फ़रमान सा जारी कर दिया, “हो गया काम, अब जाओ अपने कमरे में. मुझे अपने ऑफ़िस मीटिंग के कुछ पेपर सेट करने हैं.” 

“चश्मे की डंडी... और खाँसी की दवा....” माँ ने बाक़ी शब्द गले से बाहर निकलने न दिए. 

मोबाइल पर दौड़ती उँगलियाँ थाम बेटे ने घूरते हुए माँ को देखते हुए लगभग फुफकारा, “कहाँ आ रही खाँसी? और क्या चौबीस घंटे चश्मे का काम रहता है? बस पैसे बर्बाद करवाना है और कुछ नहीं.” 

“ऐसा नहीं बेटा....”

“अब जाओ, करते हैं कुछ व्यवस्था दो-चार दिन में.” कह कर बेटे ने उँगलियों को मोबाइल पर दौड़ाना शुरू कर दिया. 

इससे पहले कि माँ कुछ और बोल पाती, बेटे के मोबाइल ने संगीत सुनाना शुरू कर दिया. 

“हाँ, हाँ... माँ है मेरी... हाँ, मेरे ही साथ रहती है.”
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“अरे नहीं यार, वो क्या है न, आज मदर्स डे है न... इसीलिए उसके साथ की फ़ोटो पोस्ट की है.” 
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“अबे, तू भी लगा जल्दी से... अच्छे से कैप्शन के साथ....इम्प्रेशन बढ़िया पड़ता है, सब पर.”
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“उसकी चिंता छोड़, कैप्शन मैं सेंड करता हूँ अभी... चल तू फ़ोटो निकाल पहले. इन बुड्डों के फ़ोटो खिंचवाने में सौ नाटक.” 

दरवाज़े को धीरे-धीरे बढ़ती माँ न तो आज इस तरह  बेटे का लिपट कर फ़ोटो खींचना समझ पाई. न मदर्स डे का अर्थ जान पाई. बस अपनी धोती के पल्लू को मुँह तक ले जाना जान पाई, आख़िर अगले पल उठने वाली खाँसी को उसी में ही तो छिपाना है.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र 

13-05-2018 

12 May 2018

वर्तमान जनप्रतिनिधियों के स्वभाव को आईना दिखाता पत्र


आज आपके साथ एक पत्र शेयर कर रहे हैं, जो सन 1974 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य रहे श्री ध्रुव नारायण सिंह वर्मा जी ने हमारे पिताजी श्री महेन्द्र सिंह सेंगर को लिखा था. पत्र दन की तरफ से जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई जाने वाली डाक-सामग्री में लिखा गया था क्योंकि विधान परिषद् सदस्य होने सम्बन्धी उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी चिन्ह उस पर अंकित है.  यहाँ उस पत्र को प्रकाशित करने का उद्देश्य यह नहीं कि उसे किसी विधान परिषद् सदस्य द्वारा हमारे पिताजी को लिखा गया था. यह किसी और के लिए भले ही विशेष हो किन्तु हमारे लिए इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि पिताजी के राजनैतिक रूप से सक्रिय रहने के कारण ऐसे अनेकानेक पत्रों से हमारा परिचय होता रहता था. इस पत्र को यहाँ देने के पीछे का उद्देश्य इस पत्र में विधान परिषद् सदस्य की मानसिकता का परिचय देना है, उनकी इसी विशेषता का परिचय देना है.


उन्होंने पत्र में तत्कालीन समाचार-पत्र स्वतंत्र भारत का जिक्र किया है. हम लोगों के घर में यह पत्र नियमित रूप से आया करता था. पिताजी समय-समय पर कभी खबरों के रूप में, कभी सम्पादक के पत्र के रूप में समाज की समस्याओं को उठाते रहते थे. जिस पत्र का जिक्र विधान परिषद् सदस्य ध्रुव नारायण जी ने किया उसमें भी पिताजी द्वारा एक समस्या को उठाया गया था. पिताजी ने स्वतंत्र भारत समाचार-पत्र के सम्पादक के नाम पत्र में बेतवा नहर प्रखंड की कुठौंद शाखा की कैलोर माइनर की टेल-गूल सम्बन्धी समस्या को उठाया था, जिसे ध्रुव नारायण जी ने पढ़ा. यही इस पत्र की विशेष बात है कि वे उस समस्या को पढ़कर शांत नहीं रहे. उन्होंने उस समस्या, समाचार-पत्र को इंगित करते हुए पिताजी को लिखा कि वे उन्हें इस विषय में लिखें. इसके पीछे ध्रुव नारायण जी का उद्देश्य सम्बंधित समस्या को विधान परिषद् में उठाने की इच्छा रखना था.

आज कुछ कागजात खोजते समय जब इस पत्र को अचानक देखा तो लगा कि आज के और उस दौर के जनप्रतिनिधियों में कितना अंतर आ गया है. एक तबके ऐसे जनप्रतिनिधि थे जो समाचार-पत्र में सम्पादक के नाम पत्र कॉलम में प्रकाशित किसी समस्या का संज्ञान स्वतः लेकर उसे सदन में उठाने की इच्छा व्यक्त करते थे. एक आज के दौर के जनप्रतिनिधि हैं जो बार-बार ज्ञापन देने, प्रार्थना-पत्र देने, याद दिलाने के बाद भी समस्या के निस्तारण की पहल नहीं करते. आज के ऐसे जनप्रतिनिधियों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ मालूम होता है कि वे स्वयं किसी समस्या का संज्ञान लेकर उसे सदन में उठाएंगे. फ़िलहाल, ऐसे पत्र हमारी पीढ़ी की थाती तो हैं ही आज के जनप्रतिनिधियों के लिए कुछ सीख लेने का पाठ भी हैं. काश कि वे कुछ सीख पाते अपे वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों से.

10 May 2018

प्रथम स्वाधीनता संग्राम शुरू हुआ था आज ही


भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का आरम्भ आज, 10 मई 1857 को हुआ था. इसे प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के रूप में जाना जाता है. इस महान क्रांति की शुरुआत लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में हुई. 10 मई 1857 मेरठ से शुरू होकर यह धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गई. इसकी शुरुआत एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई किन्तु कालान्तर में यह ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक विद्रोह के रूप में परिवर्तित हो गई. देश की इस महान क्रान्ति को लेकर विद्धानों में मतभेद हैं. सभी इसे अपने मतानुसार अलग-अलग नामों जैसे- सिपाही विद्रोह, स्वतन्त्रता संग्राम, सामन्तवादी प्रतिक्रिया, जनक्रान्ति, राष्ट्रीय विद्रोह, मुस्लिम षडयंत्र, ईसाई धर्म के विरुद्ध एक धर्म युद्ध, सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष आदि से परिभाषित करते हैं.


1857 ई. की क्रान्ति कोई अचानक भड़का हुआ विद्रोह नहीं था वरन इसके साथ अनेक आधारभूत कारण थे. राजनीतिक कारणों में लॉर्ड डलहौज़ी की गोद निषेध प्रथा या हड़प नीति प्रमुख है. आर्थिक कारकों में मुक्त व्यापार तथा अंग्रेज़ी वस्त्रों के भारत  अधिक मात्रा में आ जाने के कारण यहाँ के कुटीर एवं लघु उद्योग नष्ट होना रहा. गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने लिखा था कि व्यापार के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा कष्टप्रद उदाहरण नहीं. भारत का मैदान सूती कपड़ा बुनने वालों के अस्थि पंजरों से भरा हुआ है. कृषि के क्षेत्र में अंग्रेज़ों की ग़लत नीति के कारण भारतीय किसानों की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई. इसके साथ-साथ धार्मिक कारणों ने भी सहायक भूमिका निभाई. अंग्रेज़ अपनी नीति के अनुसार अधिकांश भारतीयों को ईसाई बनाकर भारत में अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करना चाहते थे. सन 1850 में पास किये गये धार्मिक नियोग्यता अधिनियम द्वारा हिन्दू रीति-रिवाजों में परिवर्तन लाया गया. इस परिवर्तन से पुत्र अपने पिता की सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था. इस क़ानून का मुख्य लाभ ईसाई बनने वालों का था. इस नीति ने हिन्दू और मुसलमान दोनों में कम्पनी के प्रति संदेह उत्पन्न कर दिया. इसके अलावा अंग्रेज़ों का अपनी श्वेत चमड़ी पर नाज और भारतीयों को काली चमड़ी कहकर उनका उपहास उड़ाने जैसा सामाजिक कारण भी एक कारक बना. विलियम बैंटिक द्वारा सती प्रथा, बाल हत्या, नर हत्या आदि को प्रतिबंधित करना तथा डलहौज़ी द्वारा विधवा विवाह को मान्यता देना रूढ़िवादी भारतीयों में असन्तोष भर गया. इसके अलावा मुख्य भूमिका सैन्य असन्तोष की रही. सन 1806 में वेल्लोर में लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा माथे पर तिलक लगाने और पगड़ी पहनने पर रोक लगाना, सन 1824 में बैरकपुर में सैनिकों द्वारा समुद्र पार जाने से इनकार करने पर बर्मा रेजीमेण्ट को भंग करना, 1857 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा पारित सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम के अंतर्गत सैनिकों को जहाँ चाहे वहाँ कार्य करवाने को भेजना, 1854 के डाकघर अधिनियम में सैनिकों की निःशुल्क डाक सुविधा समाप्त करना जैसे सैन्य असंतोष के बीच चर्बीयुक्त एनफ़ील्ड कारतूसों के प्रयोग के आदेश ने आग में घी का कार्य किया. 


विद्रोह आज के दिन सांयकाल 56 बजे के मध्य प्रारम्भ हुआ. सर्वप्रथम पैदल टुकड़ी 20 एन.आई. में विद्रोह की शुरुआत हुई तत्पश्चात 3 एल.सी. में भी विद्रोह फैल गया. मंगल पाण्डे ने हियरसे को गोली मारी जबकि अफ़सर बाग की हत्या कर दी गई. 11 मई को मेरठ के क्रान्तिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुँचकर अधिकार कर मुग़ल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया. विद्रोह शीघ्र ही लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार तथा झांसी में भी फैल गया. हुमायुँ के मक़बरे में शरण लिए हुए बहादुरशाह द्वितीय को पकड़ लिया गया. उन पर मुकदमा चला और उन्हें बर्मा (रंगून) निर्वासित कर दिया गया. जुलाई 1858 तक सभी स्थानों पर विद्रोह को भले ही दबा दिया गया हो मगर पहला स्वतंत्रता संग्राम देश को आज़ादी की राह दिखा गया था.

09 May 2018

एक उद्देश्यपरक, समाजोपयोगी परियोजना की भ्रूण हत्या


सुनने-पढ़ने में अवश्य ही आप लोगों को अटपटा लग रहा होगा पर सच यही है. हमें भी उस समय अटपटा सा लगा था जबकि पता चला कि बुन्देलखण्ड लोक मंच को बंद किया जा रहा है. यह सुनने में जितना अटपटा लगा उससे कहीं अधिक झटका सा देने वाला भी लगा. झटका इसलिए भी लगा क्योंकि लोक मंच के द्वारा वरिष्ठजन मिलन केंद्र में दो दिन पहले ही महेश सक्सेना जी से मुलाकात के दौरान भावी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई थी. वे आगामी एक-दो माह में ही यहाँ कम्युनिटी रेडियो का शुभारम्भ करवाने वाले थे. इसके साथ-साथ उनके द्वारा जनपद की बेटियों के लिए अत्यंत सस्ते दरों में सेनेटरी पैड की व्यवस्था करवाने के साथ-साथ उरई में ही मशीन स्थापित करवाने की योजना थी. उसी समय उनके सहयोगी सज्जन द्वारा आर्थिक सहायता भी मंच को उपलब्ध कराई गई. ऐसे कदमों के बाद मंच का बंद किया जाना झटका देने वाला ही है.


बुन्देलखण्ड लोक मंच से हमारा कोई जुड़ाव नहीं था. एक तो हमारे पास ऐसी कोई सूचना कभी आई नहीं जो इससे जुड़ने का सन्देश देती दूसरा इसके स्थानीय ट्रस्टियों को हमारी अपनी छवि ने भयाक्रांत कर रखा है. जुड़ाव न होने के बाद भी हमारे मित्रों से इसकी गतिविधियों की जानकारी मिलना और पिछले कुछ माह से डॉ० आदित्य कुमार जी, जो हमारे अभिभावक स्वरूप हैं, के आदेश, निर्देश पर महेश सक्सेना जी से हुई कुछ मुलाकातों के बाद उनके उद्देश्यों, कार्यों, भावी योजनाओं की निस्वार्थ छवि ने बुन्देलखण्ड लोक मंच के प्रति आकर्षण जगाया. पिछले लगभग एक माह से मंच के तत्त्वावधान में संचालित वरिष्ठजन मिलन केन्द्र की व्यवस्था की अघोषित जिम्मेवारी आदित्य अंकल द्वारा हमारे कंधों पर डालने से भी इस तरफ झुकाव हुआ.

ये सच है कि फरवरी 2017 में जिस उत्साह से महेश सक्सेना जी ने समाजोपयोगी उद्देश्य के साथ बुन्देलखण्ड लोक मंच की स्थापना की थी, उनका वह उत्साह बहुत जल्दी ही गायब हो गया. इसके पीछे का कारण उनका उचित व्यक्तियों के चुनाव की कमी होना रहा. आवश्यक नहीं कि अकादमिक, व्यापारिक, राजनैतिक, नौकरीपेशा क्षेत्र में सक्रिय, सफल व्यक्ति सामाजिक जीवन में भी सफल रहे. ये भी आवश्यक नहीं कि व्यावहारिक धरालत पर भी वह कार्यशील निकले. इस मंच के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उम्र, अनुभव, नाम के आधार पर चयन करके लोक मंच का भव्य शुभारम्भ किया गया. उसके बाद तमाम सारी योजनाओं को अमल में लाने की योजना बनाई गई.

जैसा कि बहुतायत में होता है कि कमरे में बैठकर योजनायें तो बनाई जा सकती हैं मगर उनके क्रियान्वयन के लिए ठोस जमीन पर उतरना पड़ता है. बुजुर्गों के अनुभव योजनाओं में सही-गलत का आकलन भले कर लें मगर युवाओं के जोश के द्वारा ही कोई योजना वास्तविक स्वरूप पाती है. बुन्देलखण्ड लोक मंच के स्थानीय ट्रस्टी किसी भी कीमत पर युवाओं को जोड़ने को तैयार नहीं दिख रहे थे. हम जैसे कई नामों पर इन लोगों की बुलंद असहमति प्रकट की जाती रही. इसके अलावा बहुतायत अवसरों पर उनके द्वारा धन खर्चने में भी कंजूसी दिखाई गई जबकि महेश सक्सेना आरम्भ से ही विश्वास दिलाते रहे कि आर्थिक समस्या नहीं रहने दी जाएगी, बस काम वास्तविक रूप में हो, निस्वार्थ भाव से हो, समाजोपयोगी हो, धरालत पर दिखे. कम्प्यूटर प्रशिक्षण, सिलाई-कढ़ाई प्रशिक्षण, कम्युनिटी रेडियो, अन्नपूर्णा रसोई, वृद्धाश्रम, वरिष्ठजन मिलन केन्द्र आदि जैसी न जाने कितनी योजनायें बुन्देलखण्ड लोक मंच की तरफ से अमली जामा पहनने के लिए बनाई गईं. कुछ योजनायें शुरू हुईं मगर युवा टीम, आपसी विश्वास, समर्पण, भरोसे की कमी के चलते दो-चार महीने में ही वे योजनायें बंद हो गईं.


इस बीच मार्च के पहले सप्ताह में वरिष्ठजन मिलन केंद्र का शुभारम्भ किया गया. इसका भी वैसा ही हाल होने जा रहा था जैसा कि बाकी योजनाओं का हो रहा था मगर डॉ० आदित्य कुमार जी के प्रयासों से पिछले लगभग एक माह से यह मिलन केन्द्र आकार लेने लगा था. वरिष्ठजनों की संख्या में वृद्धि हो रही थी. उनके द्वारा जानकारियों, सूचनाओं, अनुभवों का आदान-प्रदान किया जा रहा था. वरिष्ठजन स्वस्थ मनोरंजन और मुलाकात के भाव से नियमित रूप से यहाँ उपस्थित हो रहे थे. बुन्देलखण्ड लोक मंच के बंद कर देने की खबर ने मिलन केन्द्र से जुड़े इन सभी लोगों को भी झटका सा दिया.

महेश सक्सेना जी नॉएडा में भी पिछले दो दशकों से बिना किसी सरकारी आर्थिक सहयोग के नॉएडा लोक मंच संचालित कर रहे हैं. इस मंच के द्वारा कम्युनिटी रेडियो, विद्यालयों का सञ्चालन, शवदाह गृह की व्यवस्था सहित अनेकानेक प्रकल्प सफलतापूर्वक चलाये जा रहे हैं. ऐसे व्यक्ति द्वारा बिना किसी तरह के आर्थिक लाभ की आशा के एक उद्देश्यपरक परियोजना उरई में शुरू की गई मगर वह यहाँ के नागरिकों की मानसिकता के चलते मूर्त रूप न पा सकी. हालाँकि कुछ माह पूर्व महेश सक्सेना जी को उनकी हताशा-निराशा की स्थिति में डॉ० आदित्य कुमार जी के निर्देशन में हम मित्रों ने उनको सकारात्मक सहयोग का भरोसा दिया था मगर शायद वे स्थानीय मुख्य ट्रस्टियों के व्यवहार और कार्यशैली से जबरदस्त नाराज हो गए थे. तभी उनके द्वारा वरिष्ठजन मिलन केंद्र का सफल सञ्चालन देखने के बाद, स्वयं उनके द्वारा सराहना करने के बाद भी हम लोगों को बुन्देलखण्ड लोक मंच के सञ्चालन की जिम्मेवारी नहीं दी गई.

बहरहाल, बुन्देलखण्ड लोक मंच की स्थापना महेश सक्सेना जी का निर्णय था जिसके क्रियान्वयन के लिए उन्होंने यहाँ के कमरों में सक्रिय रहने वाले कुछ महानुभावों पर विश्वास किया. ऐसे लोगों के स्वभाव, संकुचित कार्यशैली, पूर्वाग्रही मानसिकता के कारण जनपद जालौन एक उद्देश्यपरक, समाजोपयोगी परियोजना को खो बैठा.


06 May 2018

हँसते रहे तो जिंदा रहोगे


ये जानकार आश्चर्य हुआ कि आज, 6 मई को विश्व हास्य दिवस मनाया जा रहा है. इसे हमारी सामान्य ज्ञान में कमी भले ही समझा जाये मगर हमने व्यक्तिगत रूप से कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी कोई दिन मनाया जाता होगा. इंसानी शारीरिक क्रियाओं में हँसना स्वाभाविक क्रिया है, जिसके लिए न किसी तरह की मेहनत करनी पड़ती है, न किसी तरह का श्रम करना पड़ता है. ऐसे में यदि इस स्वाभाविक क्रिया के लिए भी एक दिन निर्धारित करना पड़े तो इसका अर्थ है कि इन्सान हँसना-मुस्कुराना भूलता जा रहा है या भुला चुका है. मई माह के पहले रविवार को मनाया जाने वाले हास्य दिवस का उद्देश्य भयग्रस्त समाज को हँसने के द्वारा कुछ देर को ही सही, भय से दूर रखना है. हास्य दिवस का विश्व हास्य दिवस के रूप में पहला आयोजन 11 जनवरी 1998 को मुंबई में किया गया था. विश्व हास्य योग आंदोलन की स्थापना डॉ० मदन कटारिया द्वारा की गई और उनके ही प्रयासों से विश्व हास्य दिवस का आरंभ संसार में शांति की स्थापना, भाईचारे, सदभाव के उद्देश्य से हुआ. वर्तमान में इस दिवस की लोकप्रियता हास्य योग आंदोलन के माध्यम से पूरी दुनिया में फैल गई. ऐसा माना जा रहा है कि इस समय अधिकांश विश्व आतंकवाद के डर से सहमा हुआ है, इसलिए हास्य दिवस की अत्यधिक आवश्यकता है. आज से पहले दुनिया में इतनी अशांति देखने को नहीं मिली थी. आज हर व्यक्ति के अंदर द्वंद्व मचा हुआ है. चूँकि हंसी के द्वारा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इस कारण प्रत्येक व्यक्ति को हँसी की महत्ता बताने के लिए इस दिवस का आरम्भ किया गया. समाज में वर्तमान में प्रचलित हास्य योग के अनुसार, हास्य सकारात्मक और शक्तिशाली भावना है, जिसमें व्यक्ति को ऊर्जावान और संसार को शांतिपूर्ण बनाने के सभी तत्त्व उपस्थित रहते हैं. यह व्यक्ति के विद्युत चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. जब व्यक्ति समूह में हंसता है तो उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पूरे क्षेत्र में फैल जाती है और क्षेत्र से नकारात्मक ऊर्जा हटती है.


विश्व हास्य दिवस के पीछे की वास्तविकता क्या है, सत्यता क्या है ये तो इसे मनाने वाले, अपनाने वाले जाने मगर व्यक्तिगत रूप से हमारा मानना है कि आज ही नहीं वरन समाज में भय सदैव से बना रहा है. वर्तमान और अतीत के भय में मूल अंतर यह था कि उस समय किसी भी स्थिति, परिस्थिति, घटना, दुर्घटना आदि से भयभीत होने वाला खुद को अकेला महसूस नहीं करता था. उस समय उसके सहयोगी, उसका परिवार, उसके मित्र, उसका पड़ोस उसके साथ दिखाई देता था. आज स्थिति इसके ठीक उलट है. आज व्यक्ति ख़ुशी को महसूस कर रहा है मगर अकेला है. अपनी खुशियों को बाँटने के अवसर उसके पास हैं मगर उसकी ख़ुशी को बाँटने वाले लोग उसके साथ नहीं हैं. ऐसे में किसी के भय के, डर के साथ कौन आकर खड़ा होगा. इसके अलावा एक और बात जो महत्त्वपूर्ण है कि आज इन्सान के भीतर अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ चुका है. उसे अपने सगे सम्बन्धियों पर भरोसा नहीं. उसे अपने मित्रों पर भरोसा नहीं. उसे अपने सहयोगियों पर विश्वास नहीं. ऐसे में भी किसी विषम स्थिति में इन्सान खुद को अकेले महसूस करता है. और सीधी सी बात है कि अकेला आदमी कितनी देर हँस सकता है, कितना मुस्कुरा सकता है. वैसे भी हमारा समाज वह है जहाँ अकेले हँसने वाले को पागल, मानसिक दीवालिया समझा जाता है.

विश्व हास्य दिवस को भले ही मनाया जाए मगर सोचा जाये कि एक दिन की हँसी किस तरह डर को दूर करेगी? एक दिन का हास्य कैसे समाज में फ़ैल रहा भय दूर करेगा? बेहतर हो कि इन्सान आपस में संबंधों को मजबूत करे. सामाजिकता का जिस तरह से लोप हो रहा है उसे दूर करने की कोशिश करे. मिलने-मिलाने का जो माहौल आज समाप्त हो चुका है उसे पुनः जिन्दा किया जाये. संबंधों में खो चुके विश्वास को फिर से लाया जाये. घरों की चाहरदीवारी से बाहर आकर समाज के मैदान पर लोगों से मिला-जुला जाये. मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी आदि पर फूहड़ कार्यक्रमों के खरीदे हुए कलाकारों को ठहाके लगाते देख हँसने की जबरिया कोशिश से बाहर निकल कर वास्तविक हास्य का आनंद लिया जाये. ऐसा नहीं कि समाज में ख़ुशी नहीं है, ऐसा नहीं है कि प्रकृति ने हास्य नहीं बिखेरा है बस खुद को जागरूक करने की आवश्यकता है. एक बार व्यक्ति अपने बनाये खोल से बाहर आने की कोशिश कर ले, एक बार वह अपने बनाये घरौंदे को तोड़ दे, एक बार वह कथित बुद्धिजीवी होने के ढोंग से बाहर निकल आये फिर उसके आसपास हास्य ही हास्य है. आज देखने में आता है कि सामाजिक रूप से किसी भी तरह की प्रस्थिति न होने के बाद भी लोग क्या कहेंगे की मानसिकता के चलते लोगों ने अपने चेहरे पर जबरन ही कठोरता चिपका रखी है. सार्वजनिक कार्यक्रमों में अकारण ही खुद को सबसे अलग दिखाने की कोशिश में हँसना भुला कर नाहक ही गंभीरता ओढ़े फिरते हैं. ऐसे लोग न खुद हँसने की कोशिश करते हैं और न ही दूसरों के हँसने में शामिल होते हैं. ऐसे लोगों ने ही हँसने को किसी दूसरे ग्रह की स्थिति बना दिया है.

जागिये, सोचिये, समझिये कि इस प्रकृति ने हमें स्वाभाविक क्रिया दी है जो न केवल खुद को प्रसन्न करती है वरन सामने वाले को भी मुग्ध करती है. पता नहीं क्यों, कब, कैसे ठहाके लगाकर हँसना, खुलकर हँसना फूहड़ता का प्रतीक बना दिया गया. हम तो आज भी खुलकर हँसते हैं, ठहाके मार कर हँसते हैं, सार्वजनिक जगहों पर खुलकर हँसते हैं, घर में बैठकर हँसते हैं, सबके साथ मिलकर हँसते हैं. मुस्कुराते चेहरे के साथ, हँसते रहने के कारण हमें तो आज तक आवश्यकता न हुई थी इस दिवस को मनाने की. कभी भय भी न लगा कि क्या होगा, कभी डर भी नहीं लगा कि क्या होने वाला है. सत्य यही है कि आने वाले समय को किसी ने नहीं देखा है, जो होना होगा वही होगा फिर आने वाले समय की अनिश्चितता के लिए वर्तमान को दुखद क्यों बनाया जाये? आज को बोझिल क्यों बनाया जाये? जो होगा गया यदि उसे बदलना हमारे हाथ नहीं तो दुखी बने रहने से क्या लाभ? इसलिए आज में जीना होगा, वर्तमान में खुद को स्थापित करना होगा और यह होगा खुद को सभी चिंताओं, डर, भय से मुक्त करके. खूब हँसिये, ठहाके लगाकर हँसिये फिर देखिये डर कैसे गायब होता है. भय कैसे दूर भागता है. हाँ, समय, स्थिति, काल, वातावरण के अनुसार सभी चीजें भली लगती हैं, हँसना भी उसमें शामिल है.

04 May 2018

उपेक्षा का शिकार हैं बुन्देलखण्ड केसरी


बुन्देलखण्ड सदैव ही अपनी आन-बान-शान के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के प्रतापी राजा अपने कार्य, साहस के कारण आज भी अमर-अजर हैं। ऐसे वीर प्रतापी राजाओं में एक महाराजा छत्रसाल का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपनी वीरता, पराक्रम और रणनीतिक कौशल से बुन्देलखण्ड को वैभवशाली राज्य के रूप में स्थापित किया था। बुन्देलखण्ड केसरी के रूप में प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल के राज्य का सीमांकन निम्न रूप में वर्णित है-
इत यमुना, उन नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस,
छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहू हौंस।

राजकीय संग्रहालय, धुबेला में स्थित महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा 

छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत् 1707 (4 मई 1649 ई०) को विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के मध्य बने जंगलों में हुआ था। उनके पिता राजा चम्पतराय को विश्वासघातियों के कारण अपना राज्य गँवा जंगलों में जाना पड़ा। इन्हीं जंगलों, प्राकृतिक वातावरण, रणभूमि में छत्रसाल का पालन-पोषण हुआ, जिससे उनमें किसी भी स्थिति से निपटने की नैसर्गिक क्षमता का विकास स्फूर्त रूप से हुआ। बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता के लिए मुगलों से संघर्ष करने वाले उनके पिता तथा उनकी माता रानी लालकुँअरि ने विश्वासघातियों के कारण आत्माहुति दे दी। ऐसे विपरीत हालातों में भी छत्रसाल ने हार न मानते हुए कालान्तर में सूझबूझ का परिचय देते हुए राष्ट्रीयता के दैदीप्यमान नक्षत्र छत्रपति शिवाजी से सन् 1668 ई० में भेंट की। छत्रपति शिवाजी उनकी वीरता, आत्मविश्वास के साथ-साथ राष्ट्रचेतना, स्वतन्त्रता के प्रति उनकी क्रियाशीलता, दूरगामी नीतियों से प्रभावित हुए। छत्रसाल को स्वतन्त्र राज्य स्थापना हेतु प्रेरित करते हुए छत्रपति शिवाजी ने समर्थगुरु रामदास के आशीष वचन सहित भवानी तलवार भेंट की-
करो देस के राज छतारे। हम तुम तें कबहूँ नहीं न्यारे।।
दौर देस मुगलन को मारो। दपटि दिली के दल संहारो।।
तुम हो महावीर मरदाने। करिहो भूमि भोग हम जाने।।
जो इतही तुमको हम राखे। तो सब सुयश हमारे भाषे।।

वीर छत्रसाल स्वराज्य का मंत्र लेकर वापस आकर और अपने साथियों की मदद से 22 वर्ष की उम्र में मात्र 5 घुड़सवारों तथा 25 पैदलों की छोटी सी सेना तैयार की। इतनी छोटी उम्र में सेना का गठन, सैनिकों का चयन वीर छत्रसाल की कार्यक्षमता, बौद्धिक प्रतिभा को दर्शाता है। सेना बनाने के बाद सबसे पहला आक्रमण उन्होंने अपने माता-पिता के विश्वासघाती सेहरा के धंधेरों पर किया। पहले आक्रमण में प्राप्त विजय से जहाँ छत्रसाल और उनके साथियों का मनोबल ऊँचा हुआ वहीं क्षेत्रवासियों में भी उनके प्रति विश्वास बढ़ा। अपनी विजय यात्रा को बढ़ाते हुए छत्रसाल बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता और उसके विस्तार हेतु लगातार प्रयासरत रहे। उन्होंने पूर्व में चित्रकूट और पन्ना का क्षेत्र, पश्चिम में ग्वालियर, उत्तर में कालपी से लेकर दक्षिण में सागर, गढ़कोटा और दमोह तक अपने राज्य का विस्तार किया। उनके रणविजय की पताका मालवा, बघेलखण्ड, राजस्थान, पंजाब तक पहराने लगी थी, जिसके चलते यमुना, चम्बल, नर्मदा, टोंस आदि नदियों में बुन्देल राज्य स्थापित हो गया था।
जैतपुर में हुए अंतिम युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित होने की स्थिति में आने लगे। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बाजीरव पेशवा को अपने पुराने सम्बन्धों का परिचय देते हुए एक काव्यात्मक पत्र लिखा, जिसकी चन्द पंक्तियाँ पूरे पत्र का सार प्रस्तुत कर देती हैं-
जो गति गज और ग्राह की, सो गति भई है आज।
बाजी जात बुन्देल की, राखौ बाजी लाज।।

इस पत्र के मिलते ही बाजीराव पेशवा की सेना ने मुहम्मद बंगश पर आक्रमण कर पराजित कर दिया। इस युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित हो सकते थे किन्तु मराठों के साथ अपने प्रगाढ़ रिश्तों के चलते अपना और बुन्देलखण्ड राज्य का सम्मान बचाए रखा। इसके बाद उन्होंने अपने राज्य का बंटवारा अपने दोनों पुत्रों और बाजीराव में कर दिया। बाजीराव से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मस्तानी, जिसे वे अपनी पुत्री मानते थे, के साथ उनका विवाह करवा दिया। बुन्देलखण्ड राज्य का विस्तार चहुँ ओर करने वाले प्रतापी महाराजा छत्रसाल ने पौष शुक्ल तृतीया संवत् 1788 (19 दिसम्बर 1731 ई०) को अपने बसाये नगर छतरपुर में नौगाँव के निकट अंतिम साँस लेकर जगमगाते नक्षत्रों में शामिल हो गये। बाजीराव पेशवा ने उनके सम्मान में समाधि-स्थल का निर्माण छतरपुर जिले में धुबेला ग्राम में धुबेला ताल के पास करवाया।

महाराजा छत्रसाल समाधि स्थल 

आजीवन बुन्देलखण्ड की स्वतन्त्रता, उसके स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने वाले महाराजा छत्रसाल की अंतिम निशानी वर्तमान में उपेक्षा का शिकार है। धुबेला में उनके नाम से राजकीय  संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इसी राजकीय संग्रहालय के पार्श्व में महाराजा छत्रसाल की पहली रानी कमलापति की स्मृति में बना समाधि स्थल है। यहाँ से लगभग एक सौ मीटर की दूरी पर महाराजा छत्रसाल की समाधि स्थित है। महाराजा छत्रसाल के नाम से संचालित राजकीय संग्रहालय में उनसे सम्बन्धित विक्रमी सम्वत 1759 (सन् 1702 ई०) का ताम्रपत्र है, जिसमें उनकी उपलब्धियों, दान देने की सनद, ताम्रपत्र लिखने की तिथि एवं स्थान आदि का उल्लेख मिलता है। महाराजा छत्रसाल को चित्रांकित करती एक पेंटिंग तथा संग्रहालय के प्रांगण में आदमकद प्रतिमा भी देखने को मिलती है।


बुन्देलखण्ड के नाम को अपने नाम से पहचान देने वाले महाराजा छत्रसाल की शासन अथवा प्रशासन स्तर से उपेक्षा की जा रही है। उनके समाधि स्थल के आसपास का स्थान कच्चा, मिट्टीदार होने के कारण बहुत बड़ी संख्या में जगली पेड़-पौधों, खरपतवारों, कंटीली झाडि़यों आदि ने उस इमारत को घेर रखा है। उसके अंदर की दीवारें जर्जर, जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हैं। वहाँ आने वालों द्वारा एवं स्थानीय लोगों द्वारा पान खाकर थूकने का, दीवारों पर खरोंचने का काम किया जा रहा है। आसपास के क्षेत्रवासियों द्वारा, युवाओं द्वारा इन गौरवशाली प्रतीकों को मौजमस्ती का अड्डा बना लिया गया है। इनके आसपास बड़ी संख्या में सिगरेट, गुटखा, तम्बाकू, शराब आदि सेवन करने के अवशेष देखने को मिलते हैं। देखा जाये तो सरकारी स्तर पर इन ऐतिहासिक स्थलों की देखरेख करने की, अराजक तत्वों से इनको बचाये रखने की, इनके जीर्णोद्धार आदि की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है। इसी कारण से इन ऐतिहासिक स्मारकों पर, धुबेला ताल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यह अपने आपमें शर्म का विषय है कि जहाँ एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्य बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान के लिए न्यौछावर कर दिया वहीं स्वयं बुन्देलखण्डवासी ही उसके प्रतीकों की, उसकी धरोहर की उपेक्षा करने में लगे हुए हैं।