13 October 2017

बड़ी जिम्मेवारी के लिए हिन्दू क्रियाकलापों की राह पर

देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का कथित दावा करने वाले आजकल खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं और दावा करने में लगे हैं कि देश संभालेंगे. पिछले कुछ महीनों से उसी पार्टी के पारिवारिक अध्यक्ष पद पर बैठने को लालायित उनके पारिवारिक उपाध्यक्ष कह भी चुके हैं कि वे बड़ी जिम्मेवारी लेने को तैयार हैं. पार्टी उपाध्यक्ष से अध्यक्ष पद पर स्थानांतरित होने को उत्सुक वे ये समझते हैं कि देश के प्रधानमंत्री का पद भी इसी तरह स्थानांतरित होकर झोली में चला आता है. हाँ, कुछ समय पहले तक अवश्य ही ऐसा होता रहा है. परिवार के अलावा वे लोग भी उच्च पदों पर शोभायमान हुए जो उस महाशय के परिवार की एक सदस्य की पेटीकोट सरकार को, किचेन कैबिनेट को शोभित कर चुके हैं. महाशय भूल गए कि वो दौर कुछ और था, ये दौर कुछ और है. तब  न तो तकनीक का इतना अधिक प्रसार-प्रचार था और न ही आम आदमी इतना जागरूक था. तब देश के सर्वोच्च पद पद पर पारिवारिक मुहर लग जाती थी. इधर आदमी भी जागरूक हुआ है, अब उसका काम सिर्फ मतदान करना भर नहीं रह गया है. अब वो सक्रियता के साथ अपनी उपस्थिति को दर्शाता भी है और सही-गलत के निर्णयों में सहभागी भी बनता है.


इन सब बातों से बेखबर पार्टी के स्व-घोषित युवराज बिना सिर-पैर की बातें करने में लगे हैं. पहले तो वे खुद को पार्टी की बड़ी जिम्मेवारी लेने के योग्य बताते हुए तमाम तरह के बयान देने में लगे थे. इसी तत्परता, आकुलता में वे देश के सर्वोच्च पद को भी पार्टी अध्यक्ष की तरह मान बैठे. अति-उत्साह में एक जगह कह बैठे कि मोदी जी पद छोड़, वे छह माह में रोजगार उपलब्ध करा देंगे. ये बयान सिवाय हास्य पैदा करने के और कुछ नहीं करता है. वे अपने आपको ये दर्शाने में लगे हैं कि उनको अपनी जिम्मेवारी का भान है, वे बड़ी से बड़ी जिम्मेवारी को उठाने में अब सक्षम हो गए हैं. इस एक बयान की बात नहीं है. उनके बयान और उनके कृत्य सदैव भारतीय राजनीति में या तो विवाद पैदा करते रहे हैं या फिर हास्य उत्पन्न करते रहे हैं. आप सभी को याद होगा कुछ माह पूर्व उन्होंने बयान दिया था कि मंदिर जाने वाले लड़कियाँ छेड़ने जाते हैं. ज़ाहिर सी बात है कि इस बयान के द्वारा वे हिंदुत्व को निशाना बनाते हुए अनेकानेक हिन्दुओं की भावनाओं को भी संदिग्ध बना रहे थे. इसके बाद अभी कुछ दिन पहले यही महानुभाव मंदिर में माथा टेकते दिखाई दिए. इनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या आप लड़कियाँ छेड़ने गए थे? स्पष्ट है कि चुनावी आहट ने उनको सचेत कर दिया है. विगत कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में जिस तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध के चलते हिन्दुओं में एकजुटता बढ़ी है, उसने तमाम राजनैतिक दलों को अचंभित कर दिया है. इसी अचम्भे को अपने पक्ष में करने की मानसिकता के चलते पुराने दल के वर्तमान युवराज मंदिर की शरण में चले गए. और तो और जोश में वे एक दिन अपने आपको जन्मजात हिन्दू भी घोषित कर चुके.


उनका मन इतने से भी नहीं माना तो वे हिन्दुओं के कृत्यों की तरफ एक कदम और बढ़ गए. पिछले दिनों हुई जघन्य घटना आप में से कोई नहीं भूला होगा. बीफ के विरोध में उनके दल के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम सड़क पर एक गाय को काट डाला. इस जघन्य वारदात पर किसी तरह का विरोध नहीं आया क्योंकि तब उनके दिमाग में अनेकानेक जगहों के वोट-बैंक के रूप में बीफ-प्रेमी दिखाई दे रहे थे. अब जबकि गुजरात में चुनाव की आहट सुनाई दे रही है तब यही बीफ समर्थक, गाय को काटने के मूक समर्थक गाय को चारा खिलाने पहुँच गए. हालाँकि वे ऐसा करते हुए भी हिन्दुओं पर, संघ पर हमला करना नहीं भूले. इस हमले में वे संघ की शाखाओं में महिलाओं को शॉर्ट्स में देखने की इच्छा व्यक्त कर गए. ये मानसिकता कहीं न कहीं उनकी पार्टी की ही मानसिकता है. कभी उनके नेता महिला को टंच माल कहते हैं तो कभी अफ़सोस व्यक्त करते हैं कि पुरानी बीवी मजा नहीं देती है. शायद ऐसी ही किसी मानसिकता के वशीभूत वे महिला शौचालय में घुस गए.


बहरहाल, देश की पुरानी पार्टी का दम भरने वालों को अपनी हरकतों को सुधारना होगा. उनके पूर्ववर्ती क्या-क्या कर गए, उनके पुरखे क्या उपलब्धियां देश को दे गए वो एक इतिहास है. उन उपलब्धियों पर, उनके सकारात्मक कार्यों पर वर्तमान के लोगों ने किस तरह का पलीता लगाया है, किस तरह भ्रष्टाचार का दीमक लगाया है इसे कोई नहीं भूल सकता है. बड़ी जिम्मेवारी लेने को आकुल युवराज यदि जल्द ही अपने कृत्यों, बयानों को न सुधारा, उन पर अंकुश न लगाया तो जल्द ही वे और उनकी पार्टी पुरानी के साथ-साथ विलुप्त होने की तरफ चल देगी. 

05 October 2017

दुनिया के अजूबों की सूची में शामिल ताजमहल को लेकर अचानक से एक विवाद खड़ा हो गया. इसकी उत्पत्ति कैसे और कब हुई ये तो विवाद बनाते लोगों के लिए भी पहेली बना हुआ था. इस विवाद के बीच उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में बतौर पर्यटन मंत्री शामिल रीता बहुगुणा ने स्पष्ट किया कि चालू वर्ष 2017-18 में पर्यटन विभाग द्वारा प्रकाशित बुकलेट में ताजमहल का नाम शामिल होने का तात्पर्य यह नहीं कि वह प्रदेश सरकार की प्राथमिकता में नहीं है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ताजमहल हमारी सांस्कृतिक विरासत है और सरकार उससे जुड़े पर्यटन स्थलों के विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. दरअसल हुआ यह कि पर्यटन विभाग द्वारा हालिया प्रकाशित पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश पर्यटन – अपार संभावनाएं’ में आगरा एवं ब्रज के आसपास के अनेक क्षेत्रों का उल्लेख लिया गया है मगर ताजमहल का उल्लेख उसमें नहीं किया गया है. इसे लेकर कुछ भाजपा-विरोधी तत्त्व सदैव की भांति सक्रिय हो गए. गनीमत रही कि इसी मुद्दे पर किसी ने पुरस्कार की वापसी नहीं की. पर्यटन मंत्री ने स्पष्ट किया कि ताजमहल और उसके आसपास के क्षेत्र के विकास के लिए सरकार की तरफ से 154 करोड़ रुपये की योजनायें स्वीकृत की गई हैं. इन योजनाओं पर अगले तीन महीने में काम शुरू भी हो जायेगा. इसके बाद भी भाजपा-विरोधियों का कुतर्क अभियान अपनी रफ़्तार से सक्रिय है.


इसमें कोई संदेह नहीं कि ताजमहल एक बेजोड़ नमूना है स्थापत्य कला का. ये इमारत हमारे ही देश की अपने समय की परिपक्व स्थापत्य कला का प्रदर्शन करती है. ये और बात है कि देश के इतिहास से खिलवाड़ करने वालों ने इस पक्ष के प्रचार के बजाय इसे प्रेम का स्मारक बनाकर प्रचारित किया. संभव है कि तत्कालीन बादशाह ने इसे अपनी विशेष महारानी के प्रेम-प्रदर्शन के लिए बनवाया हो मगर इसमें भी कोई संदेह नहीं कि ये आज विशुद्ध रूप से इस्लामिल स्मारक के रूप में ही स्थापित है. यदि ऐसा न होता तो प्रति शुक्रवार यहाँ नमाज न हो रही होती. प्रेम के स्मारक के रूप में स्थापित इस इमारत में आखिर किस कारण से नमाज अता की जाती है? यदि ये विशुद्ध प्रेम का स्मारक है तो यहाँ अन्य धर्म वालों के लिए अपने धार्मिक कृत्य करने की मनाही क्यों है? क्या इसमें भी कोई दो-राय है कि जिस तरह से तत्कालीन बादशाह अपनी विलासिता के चलते अपनी कब्रगाहों को भी वैभवता का रूप देते थे, उसे भव्यता से अलंकृत करते थे कुछ ऐसा ही ताजमहल के साथ किया गया. इसमें भी कोई दोराय नहीं होना चाहिए कि मुग़लों ने बहुसंख्यक इमारतों, स्मारकों का निर्माण हिन्दू मंदिरों का ध्वंस करके किया था. आज या फिर आज के पहले जब भी इस पर विवाद हुआ कि ताजमहल का निर्माण भी शिव मंदिर का ध्वंस करके किया गया है तो इसमें विवाद किस कारण?


आखिर किसी एक-दो व्यक्तियों के कहने पर अथवा किसी एक-दो दलों के कहने पर न तो ताजमहल को गिराया जा रहा है और न ही उसको किसी तरह से पर्यटन स्थल से बाहर किया जा रहा है. ये किसी न किसी रूप में ऐसे लोगों की सोची-समझी साजिश है जो आये दिन भाजपा-विरोधी माहौल देश-प्रदेश में बनाये रखना चाहते हैं. यहाँ ऐसे लोगों के साथ-साथ उन लोगों पर भी तरस आता है जो मात्र इतने विचार के सामने आने पर कि ताजमहल का निर्माण किसी शिव मंदिर के ऊपर किया गया है, अनाप-शनाप बकने लगते हैं. क्या सांस्कृतिक दृष्टि से इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि क्या वाकई ये सच है? आज ये एक फैशन सा बन गया है कि हर उस बात का विरोध किया जाना चाहिए जो किसी न किसी रूप में हिन्दू धर्म के, भाजपा के पक्ष में आ रही हो. एक बात सबको याद रखना चाहिए कि आज भले ही ताजमहल वैश्विक दृष्टि से भले ही पर्यटन का प्रमुख केंद्र बना हुआ हो मगर है तो आखिर में एक कब्रगाह ही. और कम से कम हिन्दुओं को किसी दूसरे धर्म के कब्रगाह की चिंता करने के पहले उस जगह की चिंता कर लेनी चाहिए जहाँ उनके पुरखों का अंतिम संस्कार किया गया है. 

03 October 2017

रोज सबेरे आता सूरज - 1100वीं पोस्ट

रोज सबेरे आता सूरज, 
हमको रोज जगाता सूरज.

पर्वत के पीछे से आकर,
अँधियारा दूर भगाता सूरज.


पंछी चहक-चहक कर गाते, 
सुबह-सुबह जब आता सूरज.

ठंडी-ठंडी पवन चले और 
फूलों को महकाता सूरज. 

गर्मी में आँख दिखाता हमको,
सर्दी में कितना भाता सूरज.

पूरब से पश्चिम तक देखो,
कितनी दौड़ लगाता सूरज.

चंदा तारे लगें चमकने,
शाम को जब छिप जाता सूरज.

काम करें हम अच्छे-अच्छे,
हमको यह सिखलाता सूरज. 

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इस ब्लॉग की यह 1100वीं पोस्ट है. 
विशेष बात ये है कि ये कविता उस समय लिखी थी, जबकि लेखक की उम्र नौ-दस वर्ष की थी. उस समय यह कविता समाचार-पत्र में प्रकाशित भी हुई थी.

बुन्देलखण्ड लोकोत्सव है टेसू-झिंझिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से पर्वों-त्योहारों से सराबोर रहा है. यहाँ भांति-भांति के अनुष्ठान आये दिन संपन्न होते रहते हैं. मेलों, पर्वों, त्योहारों से यहाँ की संस्कृति के दर्शन भी भली-भांति होते रहते हैं. इसी तरह के आयोजनों में टेसू-झिंझिया का विवाह भी शामिल है. इस आयोजन में किशोर वय के युवक-युवतियाँ भाग लेते हैं और बड़े ही उत्साह के साथ इसे संपन्न करते हैं. आश्विन माह में मनाये जाने वाले इस त्यौहार में युवक और युवतियाँ अपने-अपने अलग-अलग समूह बनाकर उत्सव मनाते हैं और फिर शरद पूर्णिमा को, जिसे बुन्देलखण्ड में टिसुआरी पूनों के नाम से जाना जाता है, दोनों समूह मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह रचाते हैं.

टेसू
इस उत्सव को आश्विन माह में मनाया जाता है. इसे किशोर वय के युवकों द्वारा मनाया जाता है. इसमें बांस की खपच्चियों के ढाँचे को चमकीले कागज से सजाकर पुरुष आकृति बनाते हैं जिसे टेसू कहा जाता है. इस पुतले को राजसी वस्त्रावरण प्रदान किया जाता है. तीर-कमान, तलवार-ढाल आदि के अलावा सर पर मुकुट या साफा बंधा होता है जो टेसू के राजा होने का संकेत करता है. ऐसी किंवदंती है कि टेसू महाभारत काल के बब्रुवाहन का प्रतीक है जिसे मरणोपरांत शमी वृक्ष पर रखे अपने सिर के द्वारा महाभारत युद्ध देखने का वरदान मिला हुआ था. बाँस की तीन खपच्चियों का ढाँचा उसी शमी वृक्ष का और सिर बब्रुवाहन का प्रतीक समझा जाता है.

टेसू के रूप में सजे पुतले को लेकर युवा घर-घर, बाजार-बाजार जाते हैं और गीत गाकर उसके बदले में अनाज या कुछ धन की माँग करते हैं. इनके द्वारा गाये गीत के माध्यम से पता चलता है कि टेसू वीर योद्धा था. टेसू आये बानवीर, हाथ लिए सोने का तीर. एक तीर से मार दिया, राजा से व्यवहार किया  गाते हुए लड़के शरद पूर्णिमा की रात्रि तक कुछ न कुछ माँगते/एकत्र करते रहते हैं. बालकों द्वारा बड़े ही विनोदात्मक तरीके से गीतों को गया जाता है जिससे उनके इस उत्सव में एक तरह की रोचकता बनी रहती है. कई बार तो लड़के आशु कवित्व के रूप में कुछ भी उलटे-पुल्टे शब्दों को जोड़कर गायन करते रहते हैं. किसी घर, दुकान आदि से कुछ भी न मिलने पर इनके द्वारा टेसू अगड़ करें, टेसू बगड़ करें. टेसू लैई के टरें या फिर टेसू मेरा यहीं खड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा. दही-बड़ा में पहिया, टेसू मांगे दस रुपईया आदि गाकर मनोरंजक रूप में कुछ न कुछ प्राप्त कर लिया जाता है. बाद में शरद पूर्णिमा की रात को इन्हीं लड़कों द्वारा बड़ी ही धूमधाम से टेसू की बारात निकाली जाती है.

झिंझिया
यह उत्सव बुन्देलखण्ड की किशोरियों द्वारा मनाया जाता है. ये भी आश्विन माह में मनाया जाने वाला उत्सव है. इसमें मिट्टी के छोटे से घड़े में अनेक छेद होते हैं. इस मटकी की में कुछ अनाज रखकर उसमें जलता हुआ दीपक रख दिया जाता है. छेदों से बाहर निकलती दीपक की रौशनी अत्यंत मनमोहक लगती है. बालिकाएँ इस जगमगाती मटकी को अपने सिर पर रखकर समूह में घर-घर जाकर नेग स्वरूप कुछ न कुछ माँगती हैं. ये किशोरियाँ भी झिंझिया गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और ये भी शरद पूर्णिमा को संचित धन से झिंझिया का विवाह टेसू से संपन्न करवाती हैं.

शरद पूर्णिमा की रात्रि को टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाएँ सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं. इस नृत्य की प्रकृति बहुत कुछ गुजरात के गरबा नृत्य के जैसी होती है. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाओं में प्रसन्नता को दर्शाता है.

टेसू-झिंझिया विवाह से एक किंवदंती और भी जुड़ी हुई है कि सुआटा नामक एक राक्षस कुंवारी कन्याओं को परेशान करता था, उनका अपहरण कर लेता था और जबरन अपनी पूजा करवाता था. उसी राक्षस ने झिंझिया नामक राजकुमारी को भी बंदी बना लिया था. टेसू नामक राजकुमार ने शरद पूर्णिमा को ही सुआटा राक्षस का वध करके झिंझिया को मुक्त करवाया तथा उससे विवाह रचाया था. बुन्देलखण्ड में बालिकाएँ किसी दीवार पर गोबर से सुआटा राक्षस की आकृति बनाती हैं जिसका वध टेसू द्वारा किया जाता है और तत्पश्चात टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है.


आधुनिकता के इस दौर में आज भले ही इस उत्सव को व्यापकता से न मनाया जा रहा हो किन्तु बुन्देलखण्ड की आंचलिकता में अभी भी इसके प्रति उत्साह देखने को मिलता है. छोटे-छोटे कस्बों, गाँवों में युवकों-युवतियों में इसके प्रति रुझान देखने को मिलता है. इस कारण ही लुप्त हो चुके अनेक पर्वों, त्योहारों के मध्य टेसू-झिंझिया का विवाह आज भी अपने आपको जीवित रखे हुए है. लोक-कलाओं, लोक-पर्वों, लोक-उत्सवों, लोक-साहित्य, लोक-गीतों के सम्वर्धन के लिए आवश्यक है कि लुप्त होती लोक-कलाओं का, लोक-पर्वों का, लोक-उत्सवों का, लोक-साहित्य का, लोक-गीतों का संरक्षण किया जाये. उनको लोकप्रियता प्रदान की जाये. 

01 October 2017

आवश्यकता है अपने अन्दर के रावण को मारने की

हम सब मिलकर फिर जलाएंगे रावण के पुतले को. हम सब फिर एक-दूसरे के साथ शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करेंगे. बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बताकर सभी लोग प्रसन्नता में विजयादशमी पर्व को संपन्न करेंगे. त्योहारों, पर्वों की विभिन्नता के बीच राष्ट्रीय एकता का सन्देश देता हमारा समाज एक और पर्व को हर्षोल्लास से मनाये जाने के बाद अपने पुराने ढर्रे पर वापस लौट आएगा. क्या एक पल को भी इस पर विचार किया है कि साल-दर-साल विजयादशमी पर रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है, क्यों? प्रतिवर्ष सांकेतिक रूप से बुराई के प्रतीक रावण को मारकर क्या वाकई समाज में अच्छाई का प्रतिपादन किया जा रहा है? क्या शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते समय किसी ने भी एक पल को समाज से न सही खुद अपने भीतर से बुराई को दूर करने का संकल्प लिया? समाज में सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराई, अत्याचार के प्रतीक रावण को सत्य और न्याय के प्रतीक राम के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्य, हिंसा, अत्याचार, बुराई आनुपातिक रूप से बढ़ती क्यों दिखाई दे रही है? शायद ऐसा हममें से कोई भी नहीं करता होगा और शायद ऐसा करने का प्रयास भी नहीं किया होगा.

देखा जाये तो विजयादशमी का पावन और महान सन्देश देने वाला पर्व आज सिर्फ सांकेतिक पर्व बनकर रह गया है. इस पावन पर्व पर इंसानी बस्तियों में छद्म रावण को, छद्म अत्याचार को समाप्त करके सभी लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. आज आवश्यकता रावण के पुतले को फूँकने की सांकेतिकता से साथ-साथ व्यावहारिक रूप में अपने भीतर बैठे अनेकानेक सिरों वाले रावण को जलाने की है. दरअसल समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. व्यक्तियों के बिना समाज का कोई आधार है ही नहीं. समाज की समस्त अच्छाइयाँ-बुराइयाँ उसके नागरिकों पर ही निर्भर करती हैं. इसके बाद भी नागरिकों में समाज के प्रति कर्तव्य-बोध जागृत नहीं हो पा रहा है. समाज के प्रति, समाज की इकाइयों के प्रति, समाज के विभिन्न विषयों के प्रति नागरिक-बोध लगातार समाप्त होता जा रहा है. इसी के चलते समाज में विसंगतियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं. विजयादशमी के पावन पर्व के मनाये जाने के बाद भी समाज से बुराइयों को दूर न कर पाने के पीछे इंसानों की यही सोच प्रभावी भूमिका निभाती है कि वो खुद समाज के लिए क्या सोचता है. आज समाज में विसंगतियों का आलम ये है कि नित्य-प्रति एक-दो नहीं सैकड़ों घटनाएँ हमारे सामने आती हैं जो समाज की विसंगतियों को दृष्टिगत करती हैं.

यह सुनने-पढने में बुरा लग सकता है मगर सत्यता यही है कि इसी इन्सान में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवार में, समाज में, संस्थानों में विभिन्न तरीके से स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा आदि-आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसा, अत्याचार, अनाचार, बुराई आदि कहीं, किसी भी रूप में सिखाये नहीं जाते हैं. सीधी सी बात है कि ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरण, देशकाल, परिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन कई तरह से लगातार किये जाते रहते हैं, इसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करके, कभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

इन्सान की इसी मूल चारित्रिक विशेषताओं या कहें कि दुर्गुणों के कारण ही समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी की, बच्चियों के साथ दुराचार की, बुजुर्गों के साथ अत्याचार की, वरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठना, अनावश्यक सी बात पर हत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जाना, सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठना, स्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इस रावण के चलते ही समाज में हिंसा, अत्याचार, अनाचार, अविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है. अविश्वास इस कदर कि आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.


सोचिये, ऐसे में आखिर क्या एक दिन रावण के सांकेतिक पुतले को मारकर सांकेतिक रूप में ही बुराई को मारने का काम कर लेंगे? हम में से शायद कोई नहीं चाहता होगा कि हमारे समाज में, हमारे परिवार में अत्याचार, अनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा है, हमारे परिवार में हो रहा है, हमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारी ही बेटियों को गर्भ में मारा जा रहा है. हमारी ही बेटियों को दहेज़ के नाम पर मारा जा रहा है. हमारे ही अपनों की संपत्ति को कब्जाया जा रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. और करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैं, हमारे अपने हैं, हम में से ही कोई हमारा है. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. न सही एक दिन में, एक बार में मगर समय-समय पर नियमित अन्तराल में अपने अन्दर के रावण की एक-एक बुराई को समाप्त करते रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जबकि हमें बाहरी रावण को मारने की जरूरत पड़ेगी. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगे, वास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगे, वास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे. 

28 September 2017

छाता लगाकर बस में यात्रा

रोडवेज बस से कालपी अपने चाचा-चाची के पास जाना हो रहा था. बरसात का मौसम था. तब पानी भी आज के जैसे छिटपुट नहीं बल्कि खूब जमकर बरसता था. इधर बस ने उरई छोड़ा ही है कि बादलों ने अपनी छटा बिखेरी. खूब झमाझम पानी. बस की खिड़कियाँ बंद कर दी गईं.

तेज बारिश के चलते कुछ बूँदें अन्दर घुस आने में सफल हो जा रही थीं. उनके चलते अपनी तरह का ही आनंद आ रहा था. तभी ये आनंद ऊपर से आता मालूम हुआ. ऊपर देखा तो बस की छत से एक-दो बूँद पानी टपक रहा है.

कुछ देर तक तो टपकती बूंदों में बड़ा अच्छा लगा मगर कुछ देर में उनके गिरने की गति बढ़ गई. हम और हमारा छोटा भाई, उस समय चार-पांच साल वाली अवस्था में होंगे, उन टपकती बूंदों से भीगने लगे तो हमको वहाँ से उठाकर दूसरी सीट पर बिठा दिया गया. कुछ देर में वहां से भी पानी गिरने लगा.

बाहर पानी लगातार तेज होता जा रहा था. बस की जंग लगी छत में पानी का भरना बराबर हो रहा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि जगह-जगह से पानी बुरी तरह से अन्दर टपकने लगा. कुछ लोग जो इस मौसम की मार को समझते थे वे अपने साथ छाता लेकर चल रहे थे. आनन-फानन उन दो-चार लोगों ने अपने-अपने छाते खोल कर बस के बच्चों को भीगने से बचाया.

आज भी खूब तेज बारिश होने पर या फिर बारिश के समय होने वाली यात्रा में वो छाता लगाकर की गई बस-यात्रा जरूर याद आ जाती है. 


24 September 2017

निम्नतर मानसिकता का विरोध

एक पत्रकार की हत्या होती है और देश भर में एकदम से आक्रोश दिखाई देने लगता है. लोग सड़कों पर उतर आते हैं. चौराहों पर मोमबत्तियाँ जलाई जाने लगती हैं. बड़े-बड़े चैनल, नामधारी पत्रकार संगठित होने लगते हैं, प्रमुख राजनैतिक व्यक्तित्व अपना निर्णय सा सुनाने लगते हैं. बहुतेरे लोग इस हत्या को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताते हैं. कुछ लोगों के लिए यह लोकतंत्र की हत्या कही जाने लगती है. यह सब देख सुनकर लगने लगता है कि क्या देश में वाकई लोकतान्त्रिक व्यवस्था शेष रही भी है या नहीं? इन सबका विलाप सुनकर मन द्रवित हो उठता है और एहसास होने लगता है कि वाकई देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी है ही नहीं. यहाँ बोली का जवाब गोली से दिया जाने लगा है. अभी इस तरह के अनजाने डर से खुद को बाहर निकाल भी न पाए थे कि एक और पत्रकार की हत्या हो जाती है. अबकी मारे जाने वाला पत्रकार अपने पीछे किसी तरह का हंगामा नहीं खड़ा कर पाता है. कोई बड़ा राजनैतिक व्यक्ति उसके समर्थन में आकर बयान नहीं देता है. किसी मीडिया संस्थान की तरफ से कोई प्रदर्शन नहीं किया जाता है. चौराहों पर इकट्ठा होकर नारेबाजी करने, मोमबत्तियाँ जलाने वाले कहीं गायब नजर आते हैं. देश से और न ही विदेश से कोई आवाज़ उठती है कि अब भी देश में बोली का जवाब गोली से दिया जा रहा है. दिमाग भन्ना जाता है कि आखिर हम सब किस युग में जी रहे हैं? क्या हम सबकी इंसानियत महज राजनैतिक विचारधाराओं में ही सिमट कर रह गई है?


मन-मष्तिष्क में उठते अनेक तरह के सवालों के बीच जब दोनों घटनाओं का और अतीत में घटित कई-कई घटनाओं का आकलन करते हैं तो पता चलता है कि विरोध की राजनीति ने, भाजपा-विरोध की राजनीति ने सभी तरह की मानवता का ह्रास कर दिया है. इस विरोध की राजनीति में किसी समय देश की राजनीति का मुख्य केंद्रबिन्दु रहा राजनैतिक दल और उसके तमाम पदाधिकारी हैं. उनका संगठित स्वरूप सिर्फ और सिर्फ भाजपा को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. उनके साथ इस खेल में वे वामपंथी ताकतें भी शामिल हैं जो विगत कई दशकों के बाद भी जनमानस के बीच अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी हैं. इन विरोधी शक्तियों को और ताकतवर बनाने का काम कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियों द्वारा भी किया जा रहा है. इन सबका आंतरिक उद्देश्य किसी न किसी तरह केंद्र सरकार को, भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. यदि ऐसा न होता तो गौरी लंकेश हत्या के मामले में चंद मिनट बाद ही आरोप न लगाया जाता कि इस हत्या में हिन्दुवादी ताकतों का, संघ का हाथ है. बिना आगापीछा सोचे तमाम बड़े मीडिया संस्थानों द्वारा, मीडिया के बड़े नामों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा. देश को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा. यदि इन लोगों को वाकई देश की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता होती तो इनके वही विरोधी मुखर स्वर शांतनु चौधरी की हत्या के बाद भी उभरने चाहिए थे. चिंता की बात तो ये रही कि इस युवा पत्रकार की हत्या पर ऐसा कुछ न हुआ. किसी भी गैर भाजपाई राजनैतिक दल की तरफ से, किसी भी मीडिया संस्थान की तरफ से इस युवा पत्रकार की हत्या पर दो शब्द भी नहीं कहे जा सके.

असल में आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस हो या फिर अस्तित्व की खोज में लगी अनेक कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां हों, सबका एकमात्र उद्देश बजाय अपने को स्थापित करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करना है. इसी के चलते उनके द्वारा अकसर भाषाई संयम खो दिया जाता है. इस भाषाई संयम खोने का उदाहरण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और कभी मंत्री रहे मनीष तिवारी के रूप में देखा जा सकता है. देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का चौथा स्तम्भ मानने वाले पत्रकार भी इस भाषाई संयम को खोने में पीछे नहीं दिखे. ये सारे लोग किसी भी रूप में इस बात को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा केंद्र में सत्तासीन होने के साथ-साथ अनेक राज्यों में अपनी सत्ता जमा चुकी है. वे सब ये भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस नरेन्द्र मोदी के पीछे सभी साजिशन विगत एक-डेढ़ दशक से पड़े हुए थे, उस व्यक्ति को किसी भी मामले में दोषी सिद्ध न कर सके. उनको ये स्वीकार नहीं हो पा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने न केवल निर्विवाद रूप से सत्ता प्राप्त की वरन लगातार अपनी छवि को भी परिष्कृत किया है. जिस तरह की वोट-बैंक की राजनीति विगत कई दशकों से देश की धुरी बनी हुई थी, मोदी ने उसे दरकिनार करते हुए विकासपरक राजनीति को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया. गैर-भाजपाई मानसिकता वाले दलों, व्यक्तियों, मीडिया संस्थाओं के लिए ये स्वीकार कर पाना अत्यंत दुष्कर होता जा रहा है कि देश के आम जनमानस ने प्रधानमंत्री की अनेक योजनाओं में न केवल उनका समर्थन किया वरन एकाधिक बार उन कठिन परिस्थितियों में भी उनका समर्थन किया जबकि लगने लगा था कि जनमानस विरोध करेगा.


देश के सामने कांग्रेस अथवा अन्य दूसरे दल अपनी मानसिकता के चलते, हिन्दू-विरोधी रवैये के कारण विश्वास जगा नहीं सके. इसी के साथ-साथ समय-समय पर उनके द्वारा उठाये गए पूर्वाग्रही कदमों ने भी जनमानस के मन-मष्तिष्क से इन दलों के प्रति, व्यक्तियों के प्रति विरोधी वातावरण तैयार किया. इस वातावरण को और पुख्ता करने का काम इन्हीं दलों, व्यक्तियों ने समय-समय पर किया. अशालीन, अशिष्ट बयानबाज़ी के चलते भी ये लोग अनजाने ही नरेन्द्र मोदी के पक्ष में, भाजपा के पक्ष में माहौल बनाते नजर आये. कुछ ऐसा ही अब रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में दिख रहा है. समझने वाली बात है कि आखिर किसी देश से उनको क्यों भगाया जा रहा है? उनके उस सम्बंधित देश से भागने या भगाए जाने का कारण क्या है? उनको देश में शरण देने के क्या औचित्य हैं? बिना सोचे-समझे सिर्फ मुसलमान होने के नाते रोहिंग्या लोग देश में शरणार्थी नहीं बनाये जाने चाहिए. एक सवाल उनका समर्थन करने वालों से कि आखिर यदि उनके प्रति मानवाधिकार का मुद्दा नजर आ रहा है, संवेदना दिखाई दे रही है तो ऐसा कुछ कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन करते समय क्यों नहीं दिखा? तब न सही तो अब क्यों नहीं दिख रहा है? आखिर वे तो किसी दूसरे देश के नहीं, इसी देश के नागरिक हैं, जिस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सही करने का स्वयंभू ठेका ये राजनेता, मीडिया संस्थान लेते नजर आते हैं. 

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, 23 सितम्बर 2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

23 September 2017

मूँछकटवा था हमारे हॉस्टल में

महिलाओं की चोटी काट लेने वाली घटनाओं की सत्यता क्या रही ये तो सम्बंधित पक्ष जाने... पर इन घटनाओं के संदर्भ में हॉस्टल की एक घटना याद आ गई...

B.Sc. करने के दौरान साइंस कॉलेज, ग्वालियर हॉस्टल में रहे। हम जैसे बहुत से नए लड़कों की दाढ़ी-मूँछ की शुरुआती झलक भी न दिखती थी तो कुछ सीनियर्स बाक़ायदा मूँछधारी थे। तमाम शरारतों के बीच हमारे राकेश शर्मा भाईसाहब (सीनियर्स को सर के स्थान पर भाईसाहब कहने की परम्परा थी) को अजीब सी शरारत सूझी। देर रात वे चुपके से अपने सहपाठी या अपने सीनियर (जो मूँछधारी होते) के कमरे में जाते और तेज़ ब्लेड के एक वार से उसकी एक तरफ़ की मूँछ उड़ा आते थे। अगला व्यक्ति जब सुबह अपनी एक तरफ़ की मूँछ उड़ी देखता तो परेशान होता, हैरान भी होता। बाक़ी लोग मौज लेते हुए इसे सात नम्बर कमरे के भूत का काम बताते। (सात नम्बर भूत की कहानी फिर कभी)

दो-चार मूँछ उड़ने के बाद पता चल गया कि ये मूँछ उड़ाने वाला भूत कौन है। इस शरारत को राकेश भाईसाहब ने उन्हीं लोगों पर आज़माया जो अपनी ज़रा-ज़रा सी मूँछों पर इतराते फिरते थे। एक तरफ़ की उड़ने के बाद अगला आदमी दूसरे तरफ़ की ख़ुद उड़ाता था। इसके बाद हम सभी ख़ूब मौज लेते थे, बिना मूँछ वाले भाईसाहब की।

इसी में एक भाईसाहब और थे, एम.पी. सिंह कुशवाह, उनकी भी एक तरफ़ की मूँछ उड़ा दी गई थी पर उन्होंने दूसरे तरफ़ की मूँछ न बनाई। जो मूँछ उड़ा दी गई थी, उस जगह वे तब तक बैंडेज लगाते रहे जब तक कि उनकी मूँछ न आ गई।

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पता नहीं आज का ये चोटी-कटवा या कुछ सालों पहले का मुँहनुचवा किसलिए ऐसा कर रहा है/कर रहा था पर हमारे भाईसाहब ने फ़ुल मौज-मस्ती-शरारत में मूँछ-उड़वा की भूमिका निभाई। इसमें किसी की मारपीट न हुई, किसी को भूत-चुड़ैल न घोषित किया गया। आज भी ये शरारत याद आने पर गुदगुदी सी होने लगती है।